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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 26
शकुन्तला (नाममुद्रां दृष्ट्वा) आर्यपुत्र, इदं तदङ्कलीयकम्‌ । राजा-अस्मादङ्कलीयोपलम्भात्‌ खलु स्मृतिरुपलब्धा । शकुन्तला-- विषमं कृतमनेन यत्तदार्यपुत्रस्य प्रत्ययकाले दुर्लभमासीत्‌ । राजा- तेन हि ऋतुसमवायचिहवं प्रतिपद्यतां लताकुसुमम्‌ । शकुन्तला- नास्य विश्वसिमि । आर्यपुत्र एवैतद्‌ धारयतु । (ततः प्रविशति मातलिः) । मातलिः-- दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदङ्निन चायुष्मान्‌ वध्ति । राजा--अभूत्‌ सम्पादितस्वादुफलो मे मनोरथः । मातले, न खलु विदितोऽयमाखण्डलेन वृत्तान्तः स्यात्‌ ? मातलिः- (सस्मितम्‌) किमीश्चराणां परोक्षम्‌ ? एत्वायुष्मान्‌ । भगवान्‌ मरीचस्ते दर्शनं वितरति । राजा--शकुन्तले, अवलम्ब्यतां पुत्रः । त्वां पुरस्कृत्य भगवन्तं द्रष्टुमिच्छामि । शकुन्तला-जिहेम्यार्यपुत्रेण सह गुरुसमीपं गन्तुम्‌ । राजा--अप्याचरितव्यमभ्युदयकालेषु । एहि । (सर्वे परिक्रामन्ति) (ततः प्रविशत्यदित्या सार्धमासनस्थो मारीचः) मारीचः- (राजानमवलोक्य) दाक्षायणि, पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी दुष्यन्त इत्यभिहितो भुवनस्य भर्ता । चापेन यस्य विनिवर्तितकर्म जातं तत्कोटिमत्कुलिशमाभरणं मघोनः ।।
शकुन्तला:-- (नामाङ्कित अँगूठी को देखकर) आर्यपुत्र, यह वही अँगूठी है (जो आप के द्वारा मेरी उंगली में पहनायी गयी थी) । राजा:-- वास्तव में इस अँगूठी के मिलने से ही तो (मुझे तुम्हारी) याद आयी । शकुन्तला:-- इस (अँगूठी) के द्वारा बहुत बुरा किया गया कि आप को विश्वास दिलाने के समय यह दुर्लभ हो गयी थी । राजा:-- तो (दुष्यन्त रूपी) वसन्त ऋतु के मिलन के चिह्न (अँगूठीरूपी) पुष्प को (शकुन्तला रूपी) लता धारण करें । शकुन्तला:-- मैं इस (अँगूठी) का विश्वास नहीं करती हूँ । आर्यपुत्र ही इसे धारण करें । (तत्पश्चात्‌ मातलि प्रवेश करता है) मातलि:-- सौभाग्य से (अपनी) धर्मपत्नी के मिलन तथा पुत्र का मुख देखने के कारण चिरञ्जीवी (आप) वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं (अर्थात्‌ पत्नी तथा पुत्र के मिलन पर आप को बधाई है) । राजा:-- मेरे मनोरथ को (आज) स्वादिष्ट फल प्राप्त हुआ है । मातलि; यह समाचार इन्द्र को तो ज्ञात नहीं हुआ होगा ? मातलि:-- (मुस्कराते हुये) ऐश्वर्यशालियों को कौन सी बात अज्ञात होती है ? (अर्थात्‌ कोई नहीं) चिरञ्जीवी (आप) आईये । भगवान्‌ कश्यप (मारीच) आप को दर्शन दे रहे हैं । राजा:-- शकुन्तला, पुत्र को संभालो । तुमको आगे कर मैं भगवान्‌ (कश्यप) का दर्शन करना चाहता हूँ । शकुन्तला:-- आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मैं लज्जा कर रही हूँ । राजा:-- अभ्युदय के समय ऐसा करना ही चाहिये । आओ; आओ । (सभी घूमते हैं) (तत्पश्चात्‌ अदिति के साथ आसन पर बैठे हुये कश्यप प्रवेश करते हैं) कश्यप:-- (राजा को देखकर) दाक्षायणि (दक्ष की पुत्री, अदिति), ये तुम्हारे पुत्र (इन्द्र) की रणभूमि में आगे-आगे चलने वाले दुष्यन्त इस नाम से विख्यात भूमण्डल (पृथ्वी) के स्वामी (राजा) हैं, जिनके धनुष के द्वारा सम्पन्न (सम्पादित) हो गया है कार्य जिसका ऐसा तेज (तीक्ष्ण) धार से युक्त वह (जगत्‌ प्रसिद्ध) वज्र इन्द्र का आभूषण (मात्र बनकर) रह गया है (अर्थात्‌ वह दायित्व विहीन होने से बेकार हो गया है) ।
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