शकुन्तला:--
(नामाङ्कित अँगूठी को देखकर) आर्यपुत्र, यह वही अँगूठी है (जो आप के द्वारा मेरी उंगली में पहनायी गयी थी) ।
राजा:--
वास्तव में इस अँगूठी के मिलने से ही तो (मुझे तुम्हारी) याद आयी ।
शकुन्तला:--
इस (अँगूठी) के द्वारा बहुत बुरा किया गया कि आप को विश्वास दिलाने के समय यह दुर्लभ हो गयी थी ।
राजा:--
तो (दुष्यन्त रूपी) वसन्त ऋतु के मिलन के चिह्न (अँगूठीरूपी) पुष्प को (शकुन्तला रूपी) लता धारण करें ।
शकुन्तला:--
मैं इस (अँगूठी) का विश्वास नहीं करती हूँ । आर्यपुत्र ही इसे धारण करें ।
(तत्पश्चात् मातलि प्रवेश करता है)
मातलि:--
सौभाग्य से (अपनी) धर्मपत्नी के मिलन तथा पुत्र का मुख देखने के कारण चिरञ्जीवी (आप) वृद्धि को प्राप्त कर रहे हैं (अर्थात् पत्नी तथा पुत्र के मिलन पर आप को बधाई है) ।
राजा:--
मेरे मनोरथ को (आज) स्वादिष्ट फल प्राप्त हुआ है । मातलि; यह समाचार इन्द्र को तो ज्ञात नहीं हुआ होगा ?
मातलि:--
(मुस्कराते हुये) ऐश्वर्यशालियों को कौन सी बात अज्ञात होती है ? (अर्थात् कोई नहीं) चिरञ्जीवी (आप) आईये । भगवान् कश्यप (मारीच) आप को दर्शन दे रहे हैं ।
राजा:--
शकुन्तला, पुत्र को संभालो । तुमको आगे कर मैं भगवान् (कश्यप) का दर्शन करना चाहता हूँ ।
शकुन्तला:--
आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मैं लज्जा कर रही हूँ ।
राजा:--
अभ्युदय के समय ऐसा करना ही चाहिये । आओ; आओ ।
(सभी घूमते हैं)
(तत्पश्चात् अदिति के साथ आसन पर बैठे हुये कश्यप प्रवेश करते हैं)
कश्यप:--
(राजा को देखकर) दाक्षायणि (दक्ष की पुत्री, अदिति), ये तुम्हारे पुत्र (इन्द्र) की रणभूमि में आगे-आगे चलने वाले दुष्यन्त इस नाम से विख्यात भूमण्डल (पृथ्वी) के स्वामी (राजा) हैं, जिनके धनुष के द्वारा सम्पन्न (सम्पादित) हो गया है कार्य जिसका ऐसा तेज (तीक्ष्ण) धार से युक्त वह (जगत् प्रसिद्ध) वज्र इन्द्र का आभूषण (मात्र बनकर) रह गया है (अर्थात् वह दायित्व विहीन होने से बेकार हो गया है) ।
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