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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 28
मातलिः- अथ किम्‌ राजा-(उपगम्य) उभाभ्यामपि वासवनियोज्यो दुष्यन्तः प्रणमति । मारीचः वत्स चिरंजीव पृथ्वीं पालय । अदितिः - वत्स, अप्रतिरथो भव । शकुन्तला - दारकसहितां वां पादवन्दनं करोमि । मारीचः वत्से, आखण्डलसमो भर्ता जयन्तप्रतिमः सुतः । आशीरन्या न ते योग्या पौलोमीसदृशी भव ।।
मातलि:-- और क्या (अर्थात् बिल्कुल ठीक है)। राजा:-- (समीप में जाकर) आप दोनों को इन्द्र का आज्ञाकारी दुष्यन्त प्रणाम करता है। कश्यप:-- बेटा, दीर्घजीवी होओ (बहुत दिनों तक जीओ)। और पृथ्वी का पालन करो। अदितिः-- बेटा, अद्वितीय महारथी होओ। शकुन्तला:-- पुत्र के साथ मैं आप दोनों के चरणों की वन्दना करती हूँ। कश्यप:-- बेटी, तुम्हारे) पति (दुष्यन्त) इन्द्र के सामान (हैं) पुत्र (सर्वदमन) (इन्द्र-पुत्र) जयन्त के समान (है) तुम पुलोमा की पुत्री (अर्थात्‌ इन्द्राणी) के समान बनो । (इसके अतिरिक्त) दूसरा आशीर्वाद तुम्हारे योग्य नहीं है ।
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