(तत्पश्चात् पूर्वोक्त कार्य करता हुआ दो तपस्विनियों के साथ बालक प्रवेश करता है)
बालक:--
हे सिंह, तुम जंभाई लो (अथवा मुंह खोलो), मैं तुम्हारे दँतों को गिनूँगा ।
पहली:--
हे अशिष्ट, हमारे सन्तान के समान (इन) प्राणियों को क्यो उत्पीडित (परेशान) कर रहे हो । ओह, तुम्हारा क्रोध बढता ही जा रहा है । ऋषियों के द्वारा तुम ठीक ही रखे गये "सर्वदमन" नाम वाले हो । (अर्थात् ऋषियों ने ठीक ही तुम्हारा “सर्वदमन" यह नाम रखा है) ।
राजा:--
न जाने क्यों इस बालक पर मेरा मन औरस पुत्र (सगे बेटे) की भाँति स्नेह कर रहा है ? निश्चित ही सन्तानहीनता मुझे (इस भाँति) स्नेह करा रही है ।
दूसरी:--
यह सिंहनी तुम पर अवश्य आक्रमण करेगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोड़ते हो ।
बालक:--
(मुस्कराकर) ओह, मैं अत्यधिक डर गया हूँ । (अपना निचला ओंठ दिखाता है) ।
राजा:--
महान् तेज का बीजस्वरूप यह बालक, चिनगारी की अवस्था में विद्यमान और इन्धन की अपेक्षा करते हुये अग्नि की भाँति मुझको प्रतीत हो रहा है ।
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