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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 15
(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टकर्मा तपस्नीभ्यां सह बालः) । बालः- जृम्भस्व सिह, दन्तांस्ते गणयिष्ये । प्रथमा-अविनीत, कि नोऽ पत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि ? हन्त, वर्धति ते सरम्भः । स्थाने खलु ऋषिजनेन सर्वदमन इति कृतनामधेयोऽसि । राजा-- किं नु खलु बालेऽ स्मन्नौरस इव पुत्रे स्निह्यति मे मनः ? नूनमनपत्या मां वत्सलयति । द्वितीया--एषा खलु केसरिणी त्वां लङ्कयति यद्यस्याः पुत्रकं न मुञसि । बालः--(सस्मितम्‌) अहो, बलीयः खलु भीतोऽस्मि । (अम्हहे, वलिं क्खु भीदो मिहं । (इत्यधरं दर्शयति) । राजा- महतस्तेजसो बीजं बालोऽयं प्रतिभाति मे। स्फुलिङ्गावस्थया वहिरेधापेक्ष इव स्थितः ।।
(तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त कार्य करता हुआ दो तपस्विनियों के साथ बालक प्रवेश करता है) बालक:-- हे सिंह, तुम जंभाई लो (अथवा मुंह खोलो), मैं तुम्हारे दँतों को गिनूँगा । पहली:-- हे अशिष्ट, हमारे सन्तान के समान (इन) प्राणियों को क्यो उत्पीडित (परेशान) कर रहे हो । ओह, तुम्हारा क्रोध बढता ही जा रहा है । ऋषियों के द्वारा तुम ठीक ही रखे गये "सर्वदमन" नाम वाले हो । (अर्थात्‌ ऋषियों ने ठीक ही तुम्हारा “सर्वदमन" यह नाम रखा है) । राजा:-- न जाने क्यों इस बालक पर मेरा मन औरस पुत्र (सगे बेटे) की भाँति स्नेह कर रहा है ? निश्चित ही सन्तानहीनता मुझे (इस भाँति) स्नेह करा रही है । दूसरी:-- यह सिंहनी तुम पर अवश्य आक्रमण करेगी यदि तुम इसके बच्चे को नहीं छोड़ते हो । बालक:-- (मुस्कराकर) ओह, मैं अत्यधिक डर गया हूँ । (अपना निचला ओंठ दिखाता है) । राजा:-- महान्‌ तेज का बीजस्वरूप यह बालक, चिनगारी की अवस्था में विद्यमान और इन्धन की अपेक्षा करते हुये अग्नि की भाँति मुझको प्रतीत हो रहा है ।
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