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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 2
राजा-मातलै, मा मैवम्‌ । स ख॑लु मनोरथानामप्यभूमिर्विसर्जनावसरसत्कारः । मम हि दिवौकसां समक्षमधसिनोपवेशितस्य- अन्तग्तिप्रार्थनमन्तिकस्थं जयन्तमुद्रीश्य . कृतस्मितेन । आमृष्टवक्षोहरिचन्दनाङ्का मन्दारमाला हरिणा -पिनद्धा ।।
राजा:-- हे मातलि, नही, ऐसा न (कहो) । विदायी के अवसर पर (इन्द्र के द्वारा) किया गया वह सत्कार तो निश्चय ही मेरे कल्पनाओं का भी विषय नहीं है (अर्थात्‌ कल्पनाओं से भी परे की वस्तु है) । क्योंकि देवताओं के सामने (अपने) आधे आसन पर बैठाकर मुझको समीप में खड़े हुये भीतर ही भीतर (मन ही मन)(माला पहनने) के इच्छुक (अपने पुत्र) जयन्त को देखकर मुस्कराते हुये इद्र ने (अपने) वक्षःस्थल पर लगे हुये हरिचन्दन से चिह्नित मन्दार-पुष्यों की माला (मुझे) पहना दी ।
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