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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 14
(नेपथ्ये) मा खलु चापलं कुरु । कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम्‌ ? राजा--(कर्णं दत्वा) अभूमिरियमविनयस्य । को नु खल्वेष निषिध्यते ? | (शब्दानुसारेणावलोक्य । सविस्मयम्‌) अये, को नु खल्वयमनुबध्यमानस्तपस्विनीभ्यामबालसत्त्वो | बालः ? अर्धपीतस्तनं मातुरामर्दक््लिष्टकेसरम्‌ ` । प्रक्रीडितुं सिहशिशं बलात्कारेण कर्षति ।।
(नेपथ्ये में) चंचलता मत करो । क्यों अपने (क्षत्रिय) स्वभाव को ही प्राप्त हो गया है ? राजा:-- (कान लगाकर) यह धृष्टता (उदण्डता) का स्थान नहीं है तो फिर यह कौन रोका जा रहा है ? (आवाज की ओर देखकर अश्चर्यपूर्वक) अरे, दो तपस्विनियों द्वारा अनुगमन किया जाता हुआ (असाधारण शक्तिशाली) युवा के समान बलशाली यह बालक कौन है ? जिसने माता के स्तनों के दूध को आधा ही पिया है तथा रगडने से (खींचने से) जिसके बाल (केसर) बिगड़ (बिखर) गये हैं ऐसे सिंहशावक (सिंह के बच्चे) को खेलने के लिये बलपूर्वक (हठपूर्वक) खींच रहा है (यह बालक कौन है ?)
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