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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 7 • श्लोक 16
ग्रथमा--वत्स, एनं बालमृगेन्रं मुञ्च । अपरं ते क्रीडनकं दास्यामि । बालः- कुत्र ? देह्येतत्‌ । राजा- (बालस्य हस्तमवलोक्य) कथं चक्रवर्तिलक्षणमप्यनेन धार्यते । तथा ह्यस्य-- प्रलोभ्यवस्तुप्रणयप्रसारितो विभाति जालग्रथिताङ्कलिः करः । अलक्ष्यपत्रान्तरमिद्धरागया नवोषसा भिन्नमिवैकपङ्कजम्‌ ।।
पहली:-- बेटा, इस सिंह के वच्चे को छोड़ दो मैं तुमको दूसरा खिलोना दूंगी । बालक:-- कहाँ है ? (खिलौना मुझको) दो । (हाथ फैलाता है) । राजा:-- (बालक के हाथ को देखकर) क्या यह चक्रवर्ती के लक्षणों को धारण कर रहा है ? क्योकि इसका लुभावनी वस्तु (खिलौने) के लिये प्रेम (अथवा अभिलाषा) के कारण फैलाया गया और जाल के समान गुंथी हयी उंगलियों वाला इस (बालक) का हाथ, ऐसा सुशोभित हो रहा है, जैसे बड़ी हुई लालिमा से युक्त नवीन उषा के द्वारा विकसित किये गये और अदृष्टि गोचर पह्लुडियों के मध्यभाग से युक्त (अर्थात्‌ जिसकी पह्लुडियों का मध्यभाग नहीं दिखायी पड़ रहा है ऐसा) अद्वितीय कमल हो ।
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