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अध्याय 1 — यमगीता

यमगीता
39 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रीमैत्रेयजी बोले - हे गुरो! मैंने जो कुछ पूछा था, वह सब आपने यथावत्‌ वर्णन किया। अब मैं एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये।
हे महामुने ! सातों द्वीप, सातों पाताल और सातों लोक - ये सभी स्थान जो इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत हैं;
स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा स्थूल और स्थूलतर जीवों से भरे हुए हैं।
हे मुनिसत्तम! एक अंगुल का आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ कर्म-बन्धन से बँधे हुए जीव न रहते हों।
किंतु हे भगवन्‌! आयु के समाप्त होने पर ये सभी यमराज के वशीभूत हो जाते हैं और उन्हीं के आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकार की यातनाएँ भोगते हैं।
तदनन्तर पाप-भोग के समाप्त होने पर वे देवादि योनियों में घूमते रहते हैं - सकल शास्त्रों का ऐसा ही मत है।
अतः आप मुझे वह कर्म बताइये, जिसे करने से मनुष्य यमराज के वशीभूत नहीं होता; मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ।
श्रीपराशरजी बोले - हे मुने! यही प्रश्न महात्मा नकुल ने पितामह भीष्म से पूछा था। उसके उत्तर में उन्होंने जो कुछ कहा था, वह सुनो।
भीष्मजी ने कहा - हे वत्स! पूर्वकाल में मेरे पास एक कलिंगदेशीय ब्राह्मण-मित्र आया और मुझसे बोला - 'मेरे पूछने पर एक जातिस्मर मुनि ने बतलाया था-
कि ये सब बातें अमुक-अमुक प्रकार ही होंगी।' हे वत्स! उस बुद्धिमान्‌ ने जो-जो बातें जिस-जिस प्रकार होने को कही थीं, वे सब ज्यों-की-त्यों हुईं।
इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जाने से मैंने उससे फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तर में उस द्विजश्रेष्ठ ने जो-जो बातें बतलायीं, उनके विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा।
एक दिन, जो बात तुम मुझ से पूछते हो, वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मण से पूछी। उस समय उसने उस मुनि के वचनों को याद करके कहा।
कि उस जातिस्मर ब्राह्मण ने यम और उनके दूतों के बीच में जो संवाद हुआ था, वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे कहता हूँ।
कालिंग बोला - अपने अनुचर को हाथ में पाश लिये देखकर यमराज ने उसके कान में कहा - भगवान्‌ मधुसूदन के शरणागत व्यक्तियों को छोड़ देना; क्‍योंकि मैं, जो विष्णुभक्त नहीं हैं - ऐसे अन्य पुरुषों का ही स्वामी हूँ।
देव-पूज्य विधाता ने मुझे “यम” नाम से लोकों के पाप-पुण्य का विचार करने के लिये नियुक्त किया है। मैं अपने गुरु श्रीहरि के वशीभूत हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान्‌ विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करने में समर्थ हैं।
जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदि के भेद से नानारूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार एक ही हरि का देवता, मनुष्य और पशु आदि नानाविध कल्पनाओं से निर्देश किया जाता है।
जिस प्रकार वायु के शान्त होने पर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथिवी से मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार गुण-क्षोभ से उत्पन्न हुए समस्त देवता, मनुष्य और पशु आदि (उसका अन्त हो जाने पर) उस सनातन परमात्मा में लीन हो जाते हैं।
जो भगवान्‌ के सुरवरवन्दित चरणकमलों की परमार्थबुद्धि से वन्दना करता है, घृताहुति से प्रज्जलित अग्नि के समान समस्त पाप-बन्धन से मुक्त हुए उस पुरुष को तुम दूर ही से छोड़कर निकल जाना।
यमराज के ऐसे वचन सुनकर पाशहस्त यमदूत ने उनसे पूछा - 'प्रभो! सबके विधाता भगवान्‌ हरि का भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिये'।
यमराज बोले - जो पुरुष अपने वर्ण-धर्म से विचलित नहीं होता, अपने सुहृद्‌ और विपक्षियों के प्रति समान भाव रखता है, बलपूर्वक किसी का द्रव्य हरण नहीं करता, और न किसी जीव की हिंसा ही करता है, उस निर्मलचित्त व्यक्ति को भगवान्‌ विष्णु का भक्त जानो।
जिस निर्मलमति का चित्त कलि-कल्मषरूप मल से मलिन नहीं हुआ और जिसने अपने हृदय में सर्वदा श्रीजनार्दन को बसाया हुआ है, उस मनुष्य को भगवान्‌ का अतीव भक्त समझो।
जो एकान्त में पड़े हुए दूसरे के सोने को देखकर भी उसे अपनी बुद्धि द्वारा तृण के समान समझता है और निरन्तर भगवान्‌ का अनन्यभाव से चिन्तन करता है, उस नरश्रेष्ठ को विष्णु का भक्त जानो।
कहाँ तो स्फटिकगिरि-शिला के समान अति निर्मल भगवान्‌ विष्णु और कहाँ मनुष्यों के चित्त में रहने वाले राग-द्वेषादि दोष! (इन दोनों का संयोग किसी प्रकार नहीं हो सकता) हिमकर (चन्द्रमा) - के किरणजाल में अग्नि-तेज की उष्णता कभी नहीं रह सकती है।
जो व्यक्ति निर्मल-चित्त, मात्सर्यरहित, प्रशान्त, शुद्ध-चरित्र, समस्त जीवों का सुहृद, प्रिय और हितवादी तथा अभिमान एवं माया से रहित होता है, उसके हृदय में भगवान्‌ वासुदेव सर्वदा विराजमान रहते हैं।
उन सनातन भगवान्‌ के हृदय में विराजमान होने पर पुरुष इस जगत्‌ के लिये शान्तस्वरूप हो जाता है, जिस प्रकार नवीन शालवृक्ष अपने सौन्दर्य से ही भीतर भरे हुए अति सुन्दर पार्थिव रस को बतला देता है।
हे दूत! यम और नियम के द्वारा जिनकी पापराशि दूर हो गयी है, जिनका हृदय निरन्तर श्रीअच्युत में ही आसक्त रहता है तथा जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं रहा है, उन मनुष्यों को तुम दूर ही से त्याग देना।
यदि खड़्ग, शंख और गदाधारी अव्ययात्मा भगवान्‌ हरि हृदय में विराजमान हैं तो उन पापनाशक भगवान्‌ के द्वारा उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्य के रहते हुए भला अन्धकार कैसे ठहर सकता है।
जो पुरुष दूसरों का धन हरण करता है, जीवों की हिंसा करता है तथा मिथ्या और कटुभाषण करता है, उस अशुभ कर्मोन्मत्त दुष्टबुद्धि के हृदय में भगवान्‌ अनन्त नहीं टिक सकते।
जो कुमति दूसरों के वैभव को नहीं देख सकता, जो दूसरों की निन्दा करता है, साधुजनों का अपकार करता है तथा (सम्पन्न होकर भी) न तो श्रीविष्णुभगवान्‌ की पूजा ही करता है और न (उनके भक्तों को) दान ही देता है, उस अधम के हृदय में श्रीजनार्दन का निवास कभी नहीं हो सकता।
जो दुष्टबुद्धि अपने परम सुहृद्‌, बन्धु-बान्धव, स्त्री, पुत्र, कन्या, माता, पिता तथा भृत्यवर्ग के प्रति अर्थतृष्णा प्रकट करता है, उस पापाचारी को भगवान्‌ का भक्त मत समझो।
जो दुर्बुद्धि पुरुष असत्कर्मो में लगा रहता है, नीच पुरुषों के आचार और उनहीं के संग में उन्मत्त रहता है तथा नित्यप्रति पापमय कर्मबन्धन से ही बँधता जाता है, वह मनुष्यरूप पशु ही है; वह भगवान्‌ वासुदेव का भक्त नहीं हो सकता।
यह सकल प्रपंच और मैं एक परमपुरुष परमेश्वर वासुदेव ही हैं, हृदय में भगवान्‌ अनन्त के स्थित होने से जिनकी ऐसी स्थिर बुद्धि हो गयी हो, उन्हें तुम दूर ही से छोड़कर चले जाना।
'हे कमलनयन! हे वासुदेव! हे विष्णो! हे धरणिधर! हे अच्युत! है शंख-चक्रपाणे! आप हमें शरण दीजिये' - जो लोग इस प्रकार पुकारते हों, उन निष्पाप व्यक्तियों कों तुम दूर से ही त्याग देना।
जिस पुरुषश्रेष्ठ के अन्त:करण में वे अव्ययात्मा भगवान्‌ विराजते हैं, उसका जहाँ तक दृष्टिपात होता है वहाँ तक भगवान्‌ के चक्र के प्रभाव से अपने बल-वीर्य नष्ट हो जाने के कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नहीं हो सकती। वह (महापुरुष) तो अन्य (वबैकुण्ठादि) लोकों का पात्र है।
कालिंग बोला - हे कुरुवर! अपने दूत को शिक्षा देने के लिये सूर्यपुत्र धर्मराज ने उससे इस प्रकार कहा। मुझसे यह प्रसंग उस जातिस्मर मुनि ने कहा था और मैंने यह सम्पूर्ण कथा तुमको सुना दी है।
श्रीभीष्मजी बोले - हे नकुल! पूर्वकाल में कलिंग-देश से आये हुए उस महात्मा ब्राह्मण ने प्रसन्‍न होकर मुझे यह सब विषय सुनाया था।
हे वत्स! वही सम्पूर्ण वृत्तान्त, जिस प्रकार कि इस संसार-सागर में एक विष्णुभगवान्‌ को छोड़कर जीव का और कोई भी रक्षक नहीं है, मैंने ज्यों-का-त्यों तुम्हें सुना दिया।
जिसका हृदय निरन्तर भगवत्परायण रहता है उसका यम, यमदूत, यमपाश, यमदण्ड अथवा यम-यातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
श्रीपराशरजी बोले - हे मुने! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार जो कुछ यम ने कहा था, वह सब मैंने तुम्हें भलीप्रकार सुना दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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