जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदि के भेद से नानारूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार एक ही हरि का देवता, मनुष्य और पशु आदि नानाविध कल्पनाओं से निर्देश किया जाता है।
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