अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्तः
सततमनार्यविशालसंगमत्तः ।
अनुदिनकृतपापबन्धयत्नः
पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्तः ॥
जो दुर्बुद्धि पुरुष असत्कर्मो में लगा रहता है, नीच पुरुषों के आचार और उनहीं के संग में उन्मत्त रहता है तथा नित्यप्रति पापमय कर्मबन्धन से ही बँधता जाता है, वह मनुष्यरूप पशु ही है; वह भगवान् वासुदेव का भक्त नहीं हो सकता।
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