न सहति परमं पदं विनिन्दां
कलुषमतिः कुरुते सतामसाधुः ।
न यजति न ददाति यश्च सन्तं
मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य ॥
जो कुमति दूसरों के वैभव को नहीं देख सकता, जो दूसरों की निन्दा करता है, साधुजनों का अपकार करता है तथा (सम्पन्न होकर भी) न तो श्रीविष्णुभगवान् की पूजा ही करता है और न (उनके भक्तों को) दान ही देता है, उस अधम के हृदय में श्रीजनार्दन का निवास कभी नहीं हो सकता।
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