जिस पुरुषश्रेष्ठ के अन्त:करण में वे अव्ययात्मा भगवान् विराजते हैं, उसका जहाँ तक दृष्टिपात होता है वहाँ तक भगवान् के चक्र के प्रभाव से अपने बल-वीर्य नष्ट हो जाने के कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नहीं हो सकती। वह (महापुरुष) तो अन्य (वबैकुण्ठादि) लोकों का पात्र है।
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