हे दूत! यम और नियम के द्वारा जिनकी पापराशि दूर हो गयी है, जिनका हृदय निरन्तर श्रीअच्युत में ही आसक्त रहता है तथा जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं रहा है, उन मनुष्यों को तुम दूर ही से त्याग देना।
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