अङ्गुलस्याष्टभागोऽपि न सोऽस्ति मुनिसत्तम ।
न सन्ति प्राणिनो यत्र कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥
हे मुनिसत्तम! एक अंगुल का आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ कर्म-बन्धन से बँधे हुए जीव न रहते हों।
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