मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
यमगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
हरिममरगणार्चितांघ्रिपद्मं प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः । तमथ गतसमस्तपापबन्धं व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम् ॥
जो भगवान्‌ के सुरवरवन्दित चरणकमलों की परमार्थबुद्धि से वन्दना करता है, घृताहुति से प्रज्जलित अग्नि के समान समस्त पाप-बन्धन से मुक्त हुए उस पुरुष को तुम दूर ही से छोड़कर निकल जाना।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
यमगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

यमगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें