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यमगीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
वसति हृदि सनातने च तस्मिन् भवतिपुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः । क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः कथयति चारुतयैव शालपोतः ॥
उन सनातन भगवान्‌ के हृदय में विराजमान होने पर पुरुष इस जगत्‌ के लिये शान्तस्वरूप हो जाता है, जिस प्रकार नवीन शालवृक्ष अपने सौन्दर्य से ही भीतर भरे हुए अति सुन्दर पार्थिव रस को बतला देता है।
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