मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
यमगीता • अध्याय 1 • श्लोक 33
कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शंखचक्रपाणे । भव शरणमितीरयन्ति ये वै त्यज भट दूरतरेण तानपापान् ॥
'हे कमलनयन! हे वासुदेव! हे विष्णो! हे धरणिधर! हे अच्युत! है शंख-चक्रपाणे! आप हमें शरण दीजिये' - जो लोग इस प्रकार पुकारते हों, उन निष्पाप व्यक्तियों कों तुम दूर से ही त्याग देना।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
यमगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

यमगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें