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यमगीता • अध्याय 1 • श्लोक 22
कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्ध्या तृणमिव यः समवैति वै परस्वम् । भवति च भगवत्यनन्यचेताः पुरुषवरं तमवेहि विष्णुभक्तम् ॥
जो एकान्त में पड़े हुए दूसरे के सोने को देखकर भी उसे अपनी बुद्धि द्वारा तृण के समान समझता है और निरन्तर भगवान्‌ का अनन्यभाव से चिन्तन करता है, उस नरश्रेष्ठ को विष्णु का भक्त जानो।
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