स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानवता द्विजः ।
यद्यदाह न तद्दृष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥
इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जाने से मैंने उससे फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तर में उस द्विजश्रेष्ठ ने जो-जो बातें बतलायीं, उनके विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा।
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