स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णु-
र्मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोषः ।
न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे
भवति हुताशनदीप्तिजः प्रतापः ॥
कहाँ तो स्फटिकगिरि-शिला के समान अति निर्मल भगवान् विष्णु और कहाँ मनुष्यों के चित्त में रहने वाले राग-द्वेषादि दोष! (इन दोनों का संयोग किसी प्रकार नहीं हो सकता) हिमकर (चन्द्रमा) - के किरणजाल में अग्नि-तेज की उष्णता कभी नहीं रह सकती है।
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