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यमगीता • अध्याय 1 • श्लोक 15
अहममरगणार्चितेन धात्रा यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः । हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः प्रभवति संयमनि ममापि विष्णुः ॥
देव-पूज्य विधाता ने मुझे “यम” नाम से लोकों के पाप-पुण्य का विचार करने के लिये नियुक्त किया है। मैं अपने गुरु श्रीहरि के वशीभूत हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान्‌ विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करने में समर्थ हैं।
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