यम उवाच -
न चलति निजवर्णधर्मतो
यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे ।
न हरति न च हन्ति किंचिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम् ॥
यमराज बोले - जो पुरुष अपने वर्ण-धर्म से विचलित नहीं होता, अपने सुहृद् और विपक्षियों के प्रति समान भाव रखता है, बलपूर्वक किसी का द्रव्य हरण नहीं करता, और न किसी जीव की हिंसा ही करता है, उस निर्मलचित्त व्यक्ति को भगवान् विष्णु का भक्त जानो।
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