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अध्याय 24 — चतुर्विंशतितम अध्याय
शिवभारतम्
63 श्लोक • केवल अनुवाद
पंडित बोले - तब मृत्यु से रक्षण हो जाए इस इच्छा से उस युद्ध से सहरसा पलायन करके सेना रहित एवं अफजल खान के न होने से लाज ऐसे उस मुसेखान प्रवृत्ति सेनापतियों ने बीजापुर जाकर क्या विचार किया और क्या किया?
अफजल खान की मृत्यु को एवं पन्हास किले की पर आदि नेता को सुनकर अति मूर्ख आदिलशाह ने स्वयं पुनः क्या किया?
और उस किले को बलात लेने के बाद अफजल खान को मारने वाले उस विश्व विजेता वीर ने क्या किया?
कविंद्र बोला - काजल याकूत अंकुश हसन और अपने परिवार के साथ बीजापुर जाकर अपने स्वामी को प्रणाम करके तथा नतमस्तक होकर अपने स्वामी के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
वह दुःखी एवं नतमस्तक हैं ऐसा देखकर, आदिलशाह गरबा युक्त वचनों से उस को प्रेरित करते हुए बोला।
आदिलशाह बोला - सहसा साहस करने के कारण स्वामी कार्य के लिए प्राणों को न्यौछावर करने वाले उसको (अफजलखान) यदि यह अवस्था प्राप्त हुई तो वह सोच नीयत को प्राप्त हुआ है ऐसा नहीं है। स्वयं धनुष कला में निपुण और कपटी स्वभाव वाले शत्रु ने उसको वहां अकेला बुलाकर निर्जन वन में मार दिया।
केवल साहस से ही कार्य सिद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं किंतु बुद्धिमत्ता के प्रक्रम में ही वास्तव में महान फलदायक होता है।
अरे रे! उस वन में अफजल खान को जिसने क्रोध से मार दिया उसकी सिर स्थित वैशाली सांप की तरह उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
अतः मेरे विरुद्ध अपराध करने वाले अत्यंत असहनीय शिवाजी को सैया जी से कांटे की तरह पूर्ण कर फेकता हूं।
अरे! वर्तमान में वह भी प्रस्थान कर के वाई आया है। तत्काल सेना लेकर वह तन्हा अकेले के लिए प्रस्थान करेगा।
इस प्रकार यह गुप्तचर इस बात को यहां कह रहे हैं अतः तुम सब उस पर आक्रमण करके बड़ा पराक्रम करो।
शत्रु का नाश करने के लिए ग्रहों की तरह अत्यंत जागरूकता के साथ उन पर प्रांतों के सेनानायक को सहायता के लिए बुलाकर और दूसरे भी अभिमानी सेनापतियों को सहायता के लिए भेजकर तुम पक्षी की तरह रात दिन बिना विश्राम के आक्रमण करते रहो। स्वराज खान के पोते महान योद्धा भिवानी तुम अजमान को हमारी सेना का सेनापति रहने दो।
इस प्रकार उन सब के साथ बोल कर उसने उनका यथोचित सत्कार किया तत्पश्चात में सभी सेनापति अपने सामर्थ्यवान स्वामी को प्रणाम करके भयंकर गर्जना करते हुए बीजापुर से बाहर निकल गए।
तत्पश्चात पहले भेजे गए गुप्तचरो ने आदिलशाह के समीप शीघ्र आकर उस पनहा किले से संबंधित समाचार सुनाया।
अपने उन्नत फन को गरुड़ के द्वारा पकड़ने पर जिस प्रकार सांप को दुख होता है उसी प्रकार उस उत्कृष्ट किले को "उस राजा ने अधीन कर लिया है" ऐसा ऐसा सुनकर आदिलशाह दुखी हुआ।
किले के स्वामी शिवाजी ने उसके किले को अधीन कर लिया है ऐसा सुनकर आदिल साहब प्रतिदिन चिंता से मन में संतप्त हो रहा है।
तब उसको निग्रहित करने के स्वयं को असमर्थ मानते हुए उसने दिल्ली के बादशाह की सेना को शीघ्र सहायता के लिए बुलवाया।
तब शिवाजी ने भी शत्रु पक्ष के सुदृढ़ युद्ध विषधारी सेनापति युद्ध करना चाहते हैं ऐसा सुनकर बंधक किले की रक्षा के लिए उग्रसेना को रखकर स्वयं उत्साही एवं उनको जीतने की इच्छा से अत्युस्तुक ऐसा वह चमकदार सैकड़ों शस्त्रों के कारण भयंकर दावा अग्नि के समान शोभायमान उस सेना के साथ वेग से आगे बढ़ गया।
शत्रु भी रुस्तुम नामक अपने अत्यंत दुर्गेश सेनापति के नेतृत्व में अभिमान के साथ आगे बढ़ गया।
तब शत्रु पक्ष की सेना दूजे यह है ऐसा देखकर रुस्तुम फाजिल्का भित्ति अपने सेनानायक उसे बोला।
रुस्तुम बोला शस्त्र अस्त्रों से सज्जा कठिन कार्यों को करने वाली अत्यंत उत्साही धैर्यवान चमकदार तेजस्वी भजो से युक्त तथा सुदृढ़ व्यूह रचना से युक्त इस शत्रु सेना को देखो।
सेना में बलराम की तरह महावीर अतुलनीय पराक्रमी शिवाजी के मानो अनेक प्रतिबिंब हो।
वह यह शिवाजी का सेनापति प्रतापी महामानी नेता जी हमारे साथ बारंबार युद्ध करने का इच्छुक है।
उसी प्रकार कवच धारी विशाल सेना से युक्त क्रोधित वह युवा जाधवराव भी हमारे पराजय का इच्छुक है।
शत्रु सेना को छिन्न-भिन्न करने वाला प्रचंड साहसी खराटे अपने हनुमंत नाम के पुत्र के साथ हमें जीतना चाहता है।
युद्ध में अर्जुन की तरह सफेद ध्वजा से युक्त विशाल सेना का अधिपति पांढरे हमारे साथ आश्चर्यजनक युद्ध करना चाहता है।
तलवार धारण करने वाला प्रलययाग्नि के समान भयंकर मानव प्रत्यक्ष एवं यमराज ही हो ऐसा काला हिलाल भी भोसले का अत्यंत हितकारी होगा।
तेजस्वी महाबाहु हिराजी इंगके, भीमाजी वाघ, सिधोजी पंवार, महावीर गोदाजी जगताप, मानो दूसरा परशुराम ही हो ऐसा महाडिक, उसी प्रकार दूसरे युद्धनिपुण बड़े-बड़े सेनानायक तथा शिवाजी राजा के सहायक आगे चलकर आ रहे हैं।
शत्रु राजा को मारने वाला, देवतुल्य शिवाजी राजे भोसले भी स्वयं युद्ध को इच्छा अनुसार जीतेगा।
अतः वास्तव में हमारे सेनानायक को भी चारों ओर से अपने-अपने सेना की व्यवस्थित व्यू रचना करके युद्ध के अग्रभग में खड़े रहना चाहिए।
मैं महान योद्धाओं में मध्य भाग की रक्षा करता हूं पराक्रमी सेनापति जल सेना के बाएं भाग की रक्षा करें।
और महाभिमानी मलिक इतबार और सादात के साथ सेना के दाएं भाग की रक्षा करें।
अजीज खान का पुत्र महा यशस्वी फतेह खान और मल्लाह यह सेना के किस भाग की रक्षा करें।
संताजी घोरपडे, सर्जेशव घाटगे और दूसरे सज्ज योद्धा ये सब चारों ओर से सेना की रक्षा करें।
इस प्रकार उनको उसके बताने पर वे सब अपने-अपने स्थान पर स्थित होकर समग्र सेना की मग्न होकर रक्षा करने लगे।
उसी समय शिवाजी राजा ने भी अपनी सेना की व्यूह रचना करते हुए याद्धाओं को समयोचित भाषण दिया।
चतुरंगिनी सेना का अधिपति यह नेताजी फाजल पर आक्रमण करें। शत्रुवीरों को मारनेवाला वाघ, मुल्लाहय पर आक्रमण करें।
मलिक इतबार पर इंगके आक्रमण करेगा, महामानी महाडिक फतेखान के साथ लडेगा।
सिधोजी पवार सादात के साथ युद्ध करें, गोदाजी यह घाटगे एवं घोरपड़े के साथ युद्ध करेगा और अग्रणी रुस्तुम नामक वीर यवन सेनाधिपति को मैं युद्ध में मारुंगा।
खराटे एवं पांढरे ये दोनों सेना के दाएं भाग पर और हिलाल और जाधव ये दोनों सेना के बाएं भाग पर साथ-साथ चलें।
इस प्रकार राजेन्द्र (शिवाजी) के भाषण देने पर उसके उस महापराक्रमी योद्धाओं ने दंदुभी ध्वनि के साथ सिंह गर्जना की।
तत्पश्चात् अनेक प्रकार की दुंदुभी, क्रचक (रणवाद्यविशेष) काहल (महाढक्का) ढोल, गोमुख (मृदंगविशेष), शृंग, इस प्रकार के दोनों सेनाओं के रणवाद्यों से दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाली ध्वनि ने आकाश को व्याप्त कर दिया।
अग्रभाग में चलने वाली ध्वजाओं के चारों ओर से आने वाले तेज से संपूर्ण आकाश विचित्र दिखने लगा था।
तत्पश्चात् मर्यादा का उल्लंघन करने वाली, गर्जना करने वाली, अत्यंत भयंकरे, पूर्व एवं पश्चिम समुद्र की तरह वह सेना आपस में भिड़ गई।
फिर एक दूसरे के समीप आई हुई उस सेना के अग्रणी, बाहुबल पर अभिमान करने वाले, योद्धाओं ने आवेश से गर्जना करते हुए एवं उत्सुकता से घोड़े को प्रेरित करके रुधिर की धाराओं से रणभूमि को भिगो दिया।
इसी बीच दौड़ने वाले घोडों के खुरों से उड़ाई गई धूल के ढेर से व्याप्त अंतरिक्ष, वर्षा के आरंभ में बहने वाले नवीन पानी से परिपूर्ण सरोवर के सामान धूसर हो गया था।
वर्षा के समय को पहचान करके नवीन मेघों की शक्ति के प्रवाह से आकाश जिस प्रकार आच्छादि हो जाता है, उसी प्रकार दौड़ने वाले धनुर्धरों के अनेक बाणों की वर्षा से वह पूर्णतः आच्छादित हो गया था।
अपने शत्रु को देखकर हर्षित हुए किसी वीर ने युद्ध में धनुष खींचा तो उसी के हाथों में स्थित भाले से उसका हाथ भेद देने पर भी वह विचलित नहीं हुआ, यह आश्चर्य हैं।
रणभूमि पर अनेक कीर्तिरूपी फूलों को तोडने के लिए धनुष रूपी लता को तत्काल खींचकर उन वीरों ने हस्तकौशल से बाणरूपी भ्रमरों के समूह को शत्रु पर वेग से उड़ा दिए।
आक्रमण करने वाले शत्रु योद्धाओं के तीक्ष्ण तलवारों के प्रभाव से मस्तक वेग से तुटकर भूमि पर गिरने पर भी ध्वजधरियों ने मुठ्ठियों से मजबूत पकड़ने के कारण ध्वजा कहीं नहीं गिर पायी।
युद्ध में शीघ्रता से प्रविष्ट घुड़सवारों के साथ मिलकर बड़े गर्व के साथ आक्रमण करने वाले रुस्तुमखान पर अग्रणी अनेक सैन्यदलों के साथ शिवाजी ने स्वयं क्रोध के साथ आक्रमण किया।
भोसले की सेना द्वारा उत्साह में फेंके गए वज्र के समान शत्रों के समूह को रुस्तुम के योद्धा, उस अति प्रचंड भीड़ में वास्तव में सहन नहीं कर सकें।
गजसमूहरूपी दुर्ग के मध्य में स्थित हुए एवं मेघ की तरह प्रचंड गर्जना करने वाले फाजल पर प्रचंड वायु के समान चारों ओर से आक्रमण करके शिवाजी के सेनापति ने उसको उद्विग्न कर दिया।
शिवाजी की सेना के नायक नेताजी को उत्तेजित हुआ देखकर फाजल ने वास्तव में प्रारंभ में ही पलायनरूपी नाटक की नांदी उच्चध्वनि से पढ़ दी थी।
रत्नों, अलंकारों से विभूषित एवं रक्तरंजित अंग वाले कुछ युवा वीर दूसरों के भय को छोड़कर वीर श्री से युक्त होकर रणभूमि पर सो गये।
उस महासंग्राम में कुछ योद्वाओं को खराटे ने कुछ को पांढरे ने, कुछ को स्वयं जाधव ने, कुछ को स्वयं बाघ ने आक्रमण करके तत्काल मार दिये थे।
उग्रकर्मा युद्धोत्सुक हीरवर्मा ने उत्साह से आक्रमण करके शत्रु को तहस-नहस कर दिया। क्रोधग्नि से फैलने वाले धुंए ने जिसकी कांति को धूसरित कर दिया है ऐसे हिलाल ने कुछ योद्धाओं को मार दिया।
रुस्तम द्वारा सहसा पलायन करने पर अव्यवस्थित हुए सादात प्रमुख की सेना को अपना रक्षण करने वाला कोई प्राप्त नहीं हुआ।
तब पराजित होकर विचलित हुआ रुस्तुमखान पांच छः घुडसवारों के साथ युद्ध से भाग गया और अत्यंत सहाय आदिलशाह की समस्त सेना ने दसों दिशाओं में पलायन किया।
तत्पश्चात् पराजित हुआ तथा अत्यंत भयभीत, सामने से वेग से पलायन करने वाले उस रुस्तुम को समीप होते हुए भी एवं पकडने योग्य होने पर भी शिवाजी ने नहीं पकड़ा, क्योंकि सूर्यवंशी राजा भयभीतों पर पराक्रम नहीं दिखाते है।
जो हमें युद्ध में छोडकर स्वयं तुरन्त भाग गये उन लज्जा रहितों का पुनः आश्रय करने में लज्जा आती है ऐसा ही मानों मन में निश्चित विचार करके उस आदिलशाह की सेना के मदमस्त हाथियों द्वारा आश्रय लिया।
प्रयत्नपूर्वक बाहर निकलने वाले सैकडों घोडो को, जिनका अंतः करण पता है ऐसी वह गहरी गर्जना करने वाली अत्यंत भयंकर, आश्चर्यजनक वेग से युक्त, प्रवाह के बढ़ने के कारण तटों से परिपूर्ण होकर प्रवाहित होने वाली खून की नदी को मस्तकों की पंक्तियों ने किस प्रकार पार किया?
इस प्रकार रुस्तुमप्रभृति शत्रुओं को भगाकर उस प्रांत को अधीन करके महादुंदुभी के मधुर ध्वनि से दिशारूपी स्त्रियों के मुखकमल को हर्षित करता हुआ शिवाजी राजा सुशोभित होने लगा।
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