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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 42
ततो भूरिप्रभेदानां दुंदुभीनामनेकशः । ऋचकानां काहळानां पणवानां च सर्वशः ॥ गोमुखानां च शृंगाणामनीकद्वयवर्तिनाम् । निध्वानः पुष्कराध्वानमावृणोद्दीर्णदिङ्गखः ॥
तत्पश्चात् अनेक प्रकार की दुंदुभी, क्रचक (रणवाद्यविशेष) काहल (महाढक्का) ढोल, गोमुख (मृदंगविशेष), शृंग, इस प्रकार के दोनों सेनाओं के रणवाद्यों से दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाली ध्वनि ने आकाश को व्याप्त कर दिया।
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