ततो भूरिप्रभेदानां दुंदुभीनामनेकशः । ऋचकानां काहळानां पणवानां च सर्वशः ॥ गोमुखानां च शृंगाणामनीकद्वयवर्तिनाम् । निध्वानः पुष्कराध्वानमावृणोद्दीर्णदिङ्गखः ॥
तत्पश्चात् अनेक प्रकार की दुंदुभी, क्रचक (रणवाद्यविशेष) काहल (महाढक्का) ढोल, गोमुख (मृदंगविशेष), शृंग, इस प्रकार के दोनों सेनाओं के रणवाद्यों से दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाली ध्वनि ने आकाश को व्याप्त कर दिया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।