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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 62
सोत्साहोत्सवशिवसंहृतप्रतीप प्रखस्ताभरणगणप्रभानुभावैः । कर्षन्ती सकुतुकलोकलोचनौघे सौभाग्यं किमपि बभार सा मृधश्रीः ॥
प्रयत्नपूर्वक बाहर निकलने वाले सैकडों घोडो को, जिनका अंतः करण पता है ऐसी वह गहरी गर्जना करने वाली अत्यंत भयंकर, आश्चर्यजनक वेग से युक्त, प्रवाह के बढ़ने के कारण तटों से परिपूर्ण होकर प्रवाहित होने वाली खून की नदी को मस्तकों की पंक्तियों ने किस प्रकार पार किया?
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