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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 18
शिवराजोऽपि तच्छ्रुत्वा घनसंनाहशालिनः । परसैन्यपतीन् भूयः संपरायाभिलाषिणः ॥ नियुज्य पृतनामुग्रां प्रणालाचलपालने । स्वयमुत्साहवानुच्चैरुत्सुकस्तज्जिगीषया ॥ स्फुरद्धेतिशतोदग्रदवाग्निसमविभ्रमैः । सैन्यैः समन्वितस्तैस्तैः पुरस्तात् तरसाभवत् ॥
तब शिवाजी ने भी शत्रु पक्ष के सुदृढ़ युद्ध विषधारी सेनापति युद्ध करना चाहते हैं ऐसा सुनकर बंधक किले की रक्षा के लिए उग्रसेना को रखकर स्वयं उत्साही एवं उनको जीतने की इच्छा से अत्युस्तुक ऐसा वह चमकदार सैकड़ों शस्त्रों के कारण भयंकर दावा अग्नि के समान शोभायमान उस सेना के साथ वेग से आगे बढ़ गया।
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