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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 47
तं वृष्टेः समयमुदीक्ष्य दीर्घसारैः आसारैर्नवजलदैरिव प्रकामम् । धावद्भिः सपदि धनुर्धरैरनेकैः बाणौ धैर्गगनतलं बताप्यधायि ॥
वर्षा के समय को पहचान करके नवीन मेघों की शक्ति के प्रवाह से आकाश जिस प्रकार आच्छादि हो जाता है, उसी प्रकार दौड़ने वाले धनुर्धरों के अनेक बाणों की वर्षा से वह पूर्णतः आच्छादित हो गया था।
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