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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 43
अग्रतः प्रचलन्तीनां पताकानां समंततः । कान्तिभिः सकलं व्योम तदा किर्मीरतां दधी ॥
अग्रभाग में चलने वाली ध्वजाओं के चारों ओर से आने वाले तेज से संपूर्ण आकाश विचित्र दिखने लगा था।
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