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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 61
येऽस्मानप्यपहाय हन्त समरे सद्योपयाताः स्वयं भूयोऽप्याश्रयितुं पाविरहितान् लज्जामहे तान् वयम्। मन्वानाः सुतरामितीव हृदये ते येदिलानीकिनी मत्तेभाः सवलं शिवं भृशवलं भेजुः शरण्यं प्रभुम् ॥
जो हमें युद्ध में छोडकर स्वयं तुरन्त भाग गये उन लज्जा रहितों का पुनः आश्रय करने में लज्जा आती है ऐसा ही मानों मन में निश्चित विचार करके उस आदिलशाह की सेना के मदमस्त हाथियों द्वारा आश्रय लिया।
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