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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 63
प्रयत्नप्रोन्मज्जत्तरगशतावशातहृदयां गभीरां गर्जन्तीं प्रतिभयतरामुद्धतरयाम् । प्रवाहप्रौढना सपदि परिपूर्णोभयतटां I कबंधानां श्रेणी कथमथ तताराश्रसरितम् ॥ इत्थं स रुस्तुममुखान् विमुखान् विधाय देशं च तं नरपतिः स्वकरे निधाय । ढक्कारवेण मधुरेण दिगंगनानां उल्लासयन्नुदलसद्वदनांबुजानि ॥ इत्यनुपुराणे सूर्यवंशे निधिवासकरकवींद्रपरमानंद प्रकाशितायां शतसाहस्यां संहितायां रुस्तुमादि भंगो नामाध्यायः ॥
इस प्रकार रुस्तुमप्रभृति शत्रुओं को भगाकर उस प्रांत को अधीन करके महादुंदुभी के मधुर ध्वनि से दिशारूपी स्त्रियों के मुखकमल को हर्षित करता हुआ शिवाजी राजा सुशोभित होने लगा।
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