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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 45
आवेशादथ भुजदंभहतचित्तैः अभ्यर्णाग तपृतनाद्वयाग्रयोथैः । गर्जद्भिः सकुतुकसंप्रणोदिताश्चैः धाराभिः समरधराभिषिच्यते स्म ॥
फिर एक दूसरे के समीप आई हुई उस सेना के अग्रणी, बाहुबल पर अभिमान करने वाले, योद्धाओं ने आवेश से गर्जना करते हुए एवं उत्सुकता से घोड़े को प्रेरित करके रुधिर की धाराओं से रणभूमि को भिगो दिया।
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