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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 13
फरादसूनुस् नुर्हि नाम्ना यो रुस्तुमेजनः । स पृथुप्रधनश्लाघी पृतनापतिरस्तु नः ॥ इत्युक्तास्तेन सर्वेऽपि सत्कृताञ्च यथोचितम् । तमात्मनः परिवृढं प्रणिपत्य प्रभाविणम् ॥ ते सैन्यपतयस्तस्मात् पुरात् विजयसाङ्ख्यात् । कृतक्ष्वेडारवोदग्राः समग्रा अपि निर्ययुः ॥
इस प्रकार उन सब के साथ बोल कर उसने उनका यथोचित सत्कार किया तत्पश्चात में सभी सेनापति अपने सामर्थ्यवान स्वामी को प्रणाम करके भयंकर गर्जना करते हुए बीजापुर से बाहर निकल गए।
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