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शिवभारतम् • अध्याय 24 • श्लोक 48
यावत् स्वं रिपुमवलोक्य लब्धहर्षः कोदण्डं किल युधि कश्चिदाचकर्ष । तावत् तत्करधृतभल्लभिन्नहस्तः तच्चित्रं यदजनि तत्र नो विहस्तः ॥
अपने शत्रु को देखकर हर्षित हुए किसी वीर ने युद्ध में धनुष खींचा तो उसी के हाथों में स्थित भाले से उसका हाथ भेद देने पर भी वह विचलित नहीं हुआ, यह आश्चर्य हैं।
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