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अध्याय 23 — त्रयोविंशतितम अध्याय

शिवभारतम्
48 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात् उन उनकी पगड़ी से पीछे दोनों हाथों से बंधे हुए, धूप से निस्तेज मुंहवाले, पगड़ी रहित, नीचे गर्दन किए हुए, खिन्न मन वाले ऐसे शत्रुपक्ष के सेनापति अपने सैनिकों को खींचकर अपने सामने इकट्ठे किए हुओं को शिवाजी ने देखा।
फिर शत्रु की सेना से लाए गए सोने एवं चांदी के सिक्के को, पेटियों में रखें हुए स्थायी रत्नों के समूह को, उसी प्रकार मोतियों के हार और सोने के अनेक ढेर उसने कुबेर के घर की तरह अपने कोषागार में रखवा दिये।
पण्डित बोले - पदातियों से युक्त इस शिवाजी राजा ने अल्लीशाह की सेना को जयवल्ली के अरण्यरूपी सागर में डुबों दिया तब तक उसका सेनापति घुड़सवारों के साथ कहां पर था? उसने क्या किया? हे कवीन्द्र बताओ।
कवीन्द्र बोला - अफजलखान नामक राक्षस को बल से मारने के लिए सज्ज होकर शत्रुनेता शिवाजी जब जयवत्ली के लिए निकला तो उसकी आज्ञा से सेनापति ने तुरन्त प्रस्थान करके शत्रु के प्रान्तों को अधीन कर लिया और नगरों को नष्ट कर दिया।
इस अवसर पर स्वामिकार्य में अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले उस वाई प्रान्त में स्थित अभिमानी यवन द्वारा प्रेषित अपना हित करने वाले एवं महापराक्रमी सेनापति शिवाजी के देश पर क्रम से आक्रमण करने लगे।
जाधव ने शूर्पप्रान्त, पांडर ने शिरबक, खराट ने सासवड़, हिलाल ने पुणे प्रान्त, हबशी और सैफखान ने मराठाओं से व्याप्त तल कोंकण में प्रवेश करके जबरदस्ती उन प्रान्तों को ले लिया।
तब अफजलखान की आज्ञा से युद्धपरायण शत्रुओं द्वारा देश की की हुई दुर्दशा को सुनकर, युद्ध के लिए उत्साहित, विख्यात, स्वामिकार्यनिष्ठ, पराक्रमी, गरुड की तरह वेगवान् शिवाजी का सेनापति सात हजार घुड़सवार एवं पदातियों के साथ लौट आया और उस पराक्रमी सेनापति को जीतने की इच्छा से शिवाजी के सुखसम्पन्न देश में चला गया।
खराटे, पांडरे, अजिंक्य जाधवराव, हिलाल और सैफखान को मैं यमलोक भेजता हूं, ऐसी अपने सेनापति की प्रतिज्ञा को सुनकर शिवाजी ने स्वयं अपने दूत के माध्यम से उसको तुरन्त संदेश प्रेषित किया।
अफजलखान नामक दुर्जेय यवन राक्षस सेना के साथ संधि करने की इच्छा से जयवल्ली आ रहा है।
अतः उस सन्धि के निर्णय होने तक तू उसके सैनिकों के साथ युद्ध मत कर किन्तु तैयार रहो।
और जिस दिन उसकी और मेरी मुलाकात होगी, उस दिन तू वाई निःसंशय होकर जा।
इस प्रकार शिवाजी राजा की स्पष्ट आज्ञा से आगे शत्रुओं से न लड़कर वह बीच में ही स्थित हो गया।
आगे जिस दिन शिवाजी एवं अफजलखान इन दोनों के बीच युद्ध हुआ तो उस दिन ही सेनापति नेताजी पालकर वाई आ गया।
उसने पकड़े नहीं अतः मुसेखान आदि दुर्जेय राक्षस दसों दिशाओं में भाग गए।
पण्डित बोलें - वह चढ़ाई, वह अवतरण, वह दुर्गम मार्ग, वह महारण्य, वह विरोधी, वह सीमा, वह भीषण रात्रि, वह पूर्ण पराभव, वह कंपकपाती अवस्था और वह असहाय स्थिति इस प्रकार जयवल्ली के चारों तरफ का स्थान होते हुए भी वे किस प्रकार भाग गए।
कवीन्द्र बोले - उस अफजलखान को शिवाजी ने मार दिया तो पलायन करने वाले यवनों को शिवाजी के पदातियों ने चारों ओर से घेर लिया।
मुसेखान, हसन, याकुत और अंकुश इनको शत्रुओं द्वारा किया हुआ अपमान सहन नहीं हुआ।
मध्याह्न में उन दोनों मराठा एवं मुसलमान सेनाओं के बीच ऊपर उड़ने वाले एवं नीचे गिरने वाले शस्त्रों के बड़े उत्पात से भयंकर युद्ध हुआ।
वह पर्वत युक्त प्रदेश पदातियों के लिए अनुकूल किन्तु घुड़सवारों के लिए प्रतिकूल था। अतः उन यवनों के मनोरथ भग्न होने से वे भय के सागर में डूब गये।
परस्पर एकचित्त होकर, एक-दूसरे की रक्षा करता हुआ शत्रु आक्रमण करेगा, इस बुद्धि से दसों दिशाओं में देखते हुए अत्यन्त उन्नत यवन, हाथी, अत्यन्त सुन्दर घोड़े, विशाल कोष और प्रिय परिवार को भी छोड़कर उस युद्ध से भाग गये। दुःखी, तमोगुणी, पेड़ों के बीच में भटकने वाले, अत्यन्त भयभीत शत्रुओं की दृष्टि से बचते हुए कांटों से सम्पूर्ण अंगों के विदीर्ण हो जाने से, रक्तरंजित, हतबल, पत्थर पर पायु एवं घुटनों के फुटने से, मार्ग के अन्वेषण में मग्न, अक्षुद्र होते हुए भी क्षुद्र बने हुए उन यवनों ने भयभीत, आंखों से नष्ट हुए, दो-तीन मनुष्यों के साथ वेग से भागते हुए चन्द्रराव के भाई प्रतापराव को संमुख देखा।
तब सभी सैनिकों के अचानक विचलित हो जाने से इसको मारना चाहिए, इस प्रकार उच्चध्वनि में उससे बोलें।
पहले चुगलखोर बनकर बारंबार आकर, सदा झूठ बोलकर एवं अपने कपट को छिपाकर उस महासेनापति अफजलखान को लाकर हमारे सहित उसकी प्रलयाग्नि के मुख में अचानक आहुति दे दी।
इस प्रकार बोलकर मारने के लिए शस्त्र उठाए हुए एवं क्रोधित उन सैनिकों को प्रतापराव मोरे ने हाथ जोड़कर पुनः-पुनः प्रणाम किया।
तत्पश्चात् वहां उसको काकुध्वनि से बोलता हुआ देखकर मुसेखान ने अपने स्वर को धीमा करके उसको करुणा से बोला।
मुसेखान बोला - यह गहन एवं दुर्गम अरण्य तूने पहले देखा ही है। अतः अग्रणी होकर किसी मार्ग से हमें बाहर लेकर चल।
वाईप्रांत पहुंचने पर हम तुझ प्राणदाता पर निष्ठा से मित्र की तरह प्रेम से उपकार करेंगे।
मुसेखान के मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर वैसा ही करता हूं, ऐसा वचन देकर अत्यन्त निश्चिन्तता के साथ वह प्रतापराव अज्ञात एवं स्वयं पूर्व देखे गये मार्ग से उनको शिवाजी के प्रान्त से बाहर निकाल दिया।
उस प्रकार छोटे भाई को छोड़कर आने से लज्जित होकर अफजलखान का पुत्र, पिता द्वार वाईप्रान्त में स्थापित हाथी, घोड़े, सामग्री, खजाना एवं कुछ योद्धाओं को साथ लेकर दुःखी अंतःकरण से वहां से तत्काल निकल गया।
वेग से पलायन करते हुए उसका पीछा करने पर भी जब उनको वह नहीं दिखा तो सेनापति पालकर पुनः वाई गया।
बलवान् एवं प्रतापी शिवाजी भी अपने से द्वेष करने वाले एवं अत्यन्त दुष्ट बुद्धि आदिलशाह से बलात् देश को शीघ्र अधीन करने के लिए सज्ज होकर, प्रस्थान दुंदुभी के घोष से दिशाओं को प्रतिध्वनित करके साथ में विशाल लेकर वाई प्रान्त पहुंच गया।
तब अपने प्रभाव से कृष्णा के तट को निष्कंटक देखकर एवं ब्राह्मणों को आनन्दित देखकर उसको आनन्द हुआ।
पुनः अपने उस सेनापति को आगे भेजकर उस पराक्रमी शिवाजी ने दूसरे देश पर अक्रमण करना प्रारम्भ किया।
आगे शत्रु सेना द्वारा रक्षित चंदन एवं वंदन इन दोनों किलों को उनकी सेना ने घेर लिया।
साक्षात् लक्ष्मीपति वह राजा केवल नाममात्र से ही शत्रुओं को भगाकर लक्ष्मी के घर श्चाल्य नामक नगर में पहुंच गया।
तत्पश्चात्, अफजलखान के विध्वंस के कारण धैर्य के नष्ट होने से तथा आश्रय से रहित हुए नायक नाम के दोनों राजाओं को जाधवराव के साथ भोसले की सेना ने पुणे प्रान्त से भगा देने के कारण खेलकर्ण का क्रीतपुत्र जो विख्यात हिलाल है, उसको आगे करके तथा उसके द्वारा अभयदान प्राप्त करके, महाशय एवं अत्यन्त दयालु शिवाजी की शरण में आकर उसका आश्रय प्राप्त किया।
नतमस्तक होकर उपहार देने वाले उन बलवान् सेनापतियों को श्रीमान् शिवाजी ने अपनेपन से संपति देकर समृद्ध किया।
तत्पश्चात् खटाव, मायणी, रामपुर, कलेढोण, बाल्लव, हलजयंतिका, अष्टी, अष्टे, वडगांव, बेलापुर, औदुंबर, मसूर, कराड़, सुपें, तांबे, पाली, नेरलें, कामेरी, बिसापुर, सावे, उरण, कोके और कोल्हापुर, इन स्थलों पर बलवान् वीरों ने सेना के साथ आक्रमण करके उनके पास से अत्यन्त कर लेकर और उनको अभय प्रदान करके उन स्थलों को अपने शासन में लायें।
फिर अपने सेना के पास उनको व्यवस्थित रखकर उस राजा ने अचानक पन्हाळ के किले को घेर लिया।
किले को घेरा हुआ देखकर दुर्गवासी लोग शीघ्र तट पर चढ़कर मेघ की तरह गर्जना करने लगे।
उन्होंने असंख्य शस्त्रों की, प्रचंड पत्थरों की एवं भयंकर उल्का बाणों की शत्रुओं पर वर्षा कर दी।
तोपों के मुख से निकलकर फैलने वाले धुएं से बादल की तरह आकाश को आच्छादित कर दिया।
तत्क्षण उदित हुए सूर्यबिंब की तरह लाल इस प्रकार तोप से निकलने वाले लोहे के गोलों की वर्षा से युद्ध को आश्चर्यचकित करने वाली शोभा प्राप्त हो गयी।
अकाशीय विद्युत् की तरह अत्यन्त आवाज करने वाले शिवाजी के सैनिकों द्वारा फेंके हुए उल्का बाण शत्रु पर इतने गिरें की उसकी शत्रु को कल्पना भी नहीं थी।
तत्पश्चात् शस्त्रों का घुमाने वाले उन समस्त शत्रुओं द्वारा रोके जाने पर भी शिवाजी के सैनिक उस किले पर बलात चढ़ गए।
चारों ओर से उछलकर आक्रमण करने वाले एवं गरुड़ की तरह वेगवान शिव सैनिकों के भयंकर तलवारों ने एवं तीक्ष्णबाणों ने शत्रु के प्राण हरण कर लियें।
शिवसैनिकों द्वारा छोड़े गए बाणों से मरने वाले दुर्गवासियों ने मानों ऋण की तरह उपभोग किए गए धन को धनकोष से पुनः दे दिया।
शत्रुओं के लिए असहनीय इस सह्याद्री के स्वामी शिवाजी ने उनके समीप से बलात् तत्काल अधीन किए हुए विंध्याचल के समान उस पन्हाळ किले पर चढ़कर उसको देखा।
अपने सैनिकों के साथ पन्हाळ किले पर गर्व से आकर वहां सेना रखकर शिवाजी ने वह संपूर्ण रात दिन की तरह व्यतीत करके वहां के तट, महल, कुएं, सुन्दर उद्यान, विशाल तालाबों द्वारा वृद्धिंगत उस किले की अनुपम शोभा को बारंबार देखा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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