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शिवभारतम् • अध्याय 23 • श्लोक 20
परस्परैकमनसः पालयन्तः परस्परम् । द्विषद्भ्यागमधिया वीक्षमाणा दिशो दश ॥ अतीव तुंगान् मातंगांस्तुरगान् सुमनोहरान् । अपारान् कोषसंभारान् परिवारान् प्रियानपि ॥ विहायापसृतास्तस्मात् समरादमरारयः । ताम्यन्तस्तामसाधयस्ते तरूनतरान्तरा ॥ भ्रमन्तः कातरतराः परेषां दृगगोचराः । कण्टकाविद्धसंर्वागाः क्षतजार्द्राः क्षतौजसः ॥ शिलाशीर्णोरुपर्वाणो मार्गान्वेषणतत्पराः । पुरः प्रतापवर्माणं चंद्रराजस्य बान्धवम् ॥ वित्रस्तं वञ्चितदृशं द्वित्रैरेव जनैर्वृतम् । द्राग विद्रवन्तमद्राक्षुरक्षुद्राः क्षुद्रताजुषः ॥
परस्पर एकचित्त होकर, एक-दूसरे की रक्षा करता हुआ शत्रु आक्रमण करेगा, इस बुद्धि से दसों दिशाओं में देखते हुए अत्यन्त उन्नत यवन, हाथी, अत्यन्त सुन्दर घोड़े, विशाल कोष और प्रिय परिवार को भी छोड़कर उस युद्ध से भाग गये। दुःखी, तमोगुणी, पेड़ों के बीच में भटकने वाले, अत्यन्त भयभीत शत्रुओं की दृष्टि से बचते हुए कांटों से सम्पूर्ण अंगों के विदीर्ण हो जाने से, रक्तरंजित, हतबल, पत्थर पर पायु एवं घुटनों के फुटने से, मार्ग के अन्वेषण में मग्न, अक्षुद्र होते हुए भी क्षुद्र बने हुए उन यवनों ने भयभीत, आंखों से नष्ट हुए, दो-तीन मनुष्यों के साथ वेग से भागते हुए चन्द्रराव के भाई प्रतापराव को संमुख देखा।
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