परस्पर एकचित्त होकर, एक-दूसरे की रक्षा करता हुआ शत्रु आक्रमण करेगा, इस बुद्धि से दसों दिशाओं में देखते हुए अत्यन्त उन्नत यवन, हाथी, अत्यन्त सुन्दर घोड़े, विशाल कोष और प्रिय परिवार को भी छोड़कर उस युद्ध से भाग गये। दुःखी, तमोगुणी, पेड़ों के बीच में भटकने वाले, अत्यन्त भयभीत शत्रुओं की दृष्टि से बचते हुए कांटों से सम्पूर्ण अंगों के विदीर्ण हो जाने से, रक्तरंजित, हतबल, पत्थर पर पायु एवं घुटनों के फुटने से, मार्ग के अन्वेषण में मग्न, अक्षुद्र होते हुए भी क्षुद्र बने हुए उन यवनों ने भयभीत, आंखों से नष्ट हुए, दो-तीन मनुष्यों के साथ वेग से भागते हुए चन्द्रराव के भाई प्रतापराव को संमुख देखा।
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