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शिवभारतम् • अध्याय 23 • श्लोक 27
स इमां गिरमकार्ण्य मुसेखानमुखोद्रताम् । तथेति संप्रतिश्रुत्य भृशविश्रब्धमानसः ॥ केनाप्यज्ञायमानेन दृष्टपूर्वेण वर्मना । द्राक्तान् निष्कामयामास शिवस्य विषयाद्वहिः ॥
मुसेखान के मुख से निकले हुए इन शब्दों को सुनकर वैसा ही करता हूं, ऐसा वचन देकर अत्यन्त निश्चिन्तता के साथ वह प्रतापराव अज्ञात एवं स्वयं पूर्व देखे गये मार्ग से उनको शिवाजी के प्रान्त से बाहर निकाल दिया।
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