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अध्याय 21 — प्रथमविंशति अध्याय
शिवभारतम्
46 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोला - तत्पश्चात् एक दूसरे से मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक, उस कार्य में तत्पर बुद्धिवाले एवं अपनी-अपनी राजनीति से व्यवहार करने वाले उन दोनों दूतों के बीच जैसा करार हुआ था वह सब बताता हूं, हे पण्डितों ध्यान से सुनो!
अपनी सेना को यथास्थिति में रख करके स्वयं अफजलखान सशस्त्र आयें और पालकी में बैठकर आगे जायें, उनकी सेवा के लिए दो-तीन ही सेवक होने चाहिए, उसी प्रकार वह प्रतापगढ़ की उपत्यका के पास स्वयं आकर वहीं पर सभामंडप में शिवाजी की प्रतीक्षा करें और शिवाजी सशस्त्र आकर उस अतिथि का आदर सत्कार गौरव के साथ यथाविधि करें। दोनों के ही रक्षणार्थ सज्ज, स्वामिनिष्ठ, शूर एवं निष्ठावान् दस-दस सैनिक बाणों की सीमा पर आकर पृष्ठभाग में खड़े हो जायें और दोनों के आपस में मिलने पर सभी लोग आनन्दकारी बातें करें।
इस प्रकार करार करके एवं अन्दर से कपटभाव से युक्त होकर एक दूसरे से मिलने के इच्छुक वे दोनों उस समय सुशोभित हुए।
तत्पश्चात् वह प्रतापगढ़ के स्थलभाग की ओर आ रहा है, ऐसा सुनकर शिवाजी महाराज सज्ज होते हुए सुशोभित होने लगे।
पुरोहित के द्वारा निर्दिष्ट विविध प्रकार की विधि से देवाधिदेव शंकर की नित्य की तरह पूजा करके, नित्य की दानविधि को करके, थोड़ा भोजन करके, स्वयं शुद्ध सीमित जल को बारंबार आचमन की तरह पीकर उस तुळजा देवी का क्षणमात्र मन में चिन्तन किया, उस समय के लिए उचित वेशभूषा को धारण करके लोक में अनुपम अपने मुख को दर्पण में देखा, शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों को नमस्कार करके उन सबका शुभ आशीर्वाद लिया, दही, दुर्वा अक्षत इनकों स्पर्श किया, सूर्यमण्डल देखा, सामने खड़ी बछड़े से युक्त गाय के समीप जाकर तत्काल सुवर्ण सहित उसको गुणवान् ब्राह्मण को दे दिया, अपने पीछे आने के लिए सज्ज पराक्रमी अनुयायियों को प्रतापगड़ की सुरक्षार्थ नियुक्त किया और मन में कपट को रख समीप आकर स्थित उस यवन की ओर वह महाबुद्धिमान् शिवाजी अपने अतिथि के संमुख जिस प्रकार जाना चाहिए, उस प्रकार स्नेहभाव से गया।
उत्तम कवच को धारण किया हुआ शिवाजी राजे भोंसले, पुष्पगुच्छ को धारण करने से, सफेद पगड़ी से एवं केसर के छिड़काव किए गए अंगरखे से वह अत्यंत सुशोभित हो रहा था। उस वज्रयुक्त शरीर के लिए उस कवच की क्या जरुरत है?
एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में पट्टे को धारण करने वाला वह शिवाजी राजा नंदक तलवार एवं कौमुदकी गदा को धारण करने वाले प्रखर विष्णु के समान दिख रहा था।
पुनः किले के तट से सिंह की तरह बाहर निकलकर शीघ्र पगों को रखते हुए अत्यन्त समीप आकर खड़े हुए, अंकुशाग्र के समान सुन्दर, विशाल और लंबी दाढ़ी से भयंकर दिखने वाले, धैर्यवान् एवं धैर्वदृष्टि से युक्त शिवाजी को शत्रु ने देखा।
जैसे इन्द्र ने वृत्र को देखा उसी प्रकार शिवाजी ने भी मुस्कुराते हुए सामने स्थित उसकी दृष्टि से दृष्टि को मिलाया।
क्रोधित यम की तरह सामने खड़े हुए उसने दक्ष वीर शिवाजी को अपने पर विश्वस्त करने के लिए अपने हाथ में स्थित अबाधगति वाली तलवार को उस क्रोधित, कपटी दुष्ट ने पास में खड़े हुए अपने सेवक के हाथ में दे दी।
तत्पश्चात् मिथ्या स्नेह दिखाकर, प्रतिकूल भाग्य से हत वह अफजखान उससे ऊंचे स्वर में बोला।
अफजल बोला - अरे! मिथ्या युद्धोत्साह को धारण करने वाले एवं अत्यन्त स्वच्छंद व्यवहार करने वाले नीतिमार्ग को छोड़कर कुमार्ग को क्यों धारण करते हो?
आदिलशाह की कुतुबशाह की या फिर महाबलवान् दिल्लीपति की भी सेवा नहीं करता है और नहीं उन्हें मानता है और अपने पर ही गर्व करता है।
अतः आज मैं दुर्विनीत तुझको दण्ड देने के लिए आया हूं। यह किला मुझे दें और मेरी शरण में आ जा।
मैं तुझे अपने हाथ से पकड़कर तथा बिजापुर ले जाकर अल्लीशाह के सामने तेरे मस्तक को झुकवाते हुए उस प्रतापी स्वामी से हाथ जोड़कर निवेदन करूंगा और हे राजा! तुझे फिर उससे अत्यन्त वैभव को प्राप्त करवाउंगा।
अरे! शहाजी राजा के पुत्र, बच्चे, अपनी होशयारी को छोड़कर अपने हाथ को मेरे हाथों में दे और आलिंगन कर।
इस प्रकार बोलकर उसने उसकी गर्दन को बाएं हाथ से पकड़कर दूसरे दाएं हाथ से उसके पेट में कटार घुसा दी।
बाहुयुद्ध में निपुण शिवाजी ने तत्काल उसके हाथ से गर्दन को छुड़ाकर अत्यन्त गंभीर ध्वनि से गुफाओं को प्रतिध्वनित किया और विचलित हुए बिना अपने अवयवों को थोड़ा संकुचित करके शिवाजी ने अपने पेट में घुसने वाली कटार से स्वयं को बचाया।
यह प्रहार तेरे पर करता हूं, वह ले, मुझे पकड़ इस प्रकार बोलता हुआ, सिंह के समान ध्वनि, सिंह के समान गति, सिंह के समान शरीर, सिंह जैसी दृष्टि, सिंह जैसी गर्दन वाला एवं अपने दोनों हाथों से घुमायी हुई नंगी तलवार से शोभायमान वह धैर्यवान् एवं सक्रिय शिवाजी, उस शत्रु से प्रतिशोध लेने में प्रवृत्त होकर अपने तलवार का अग्रभाग उसके पेट में घुसा दिया।
उसने शत्रु के पेट में पृष्ठभाग पर्यन्त शीघ्र घुसायी गई उस तलवार से सभी अंतडिया खींचकर बाहर गिर गई।
क्रोधित कार्तिकेय की शक्ति जैसे क्रौंच पर्वत को विदीर्ण करके सुशोभित हुई, उसी प्रकार शिवाजी की तलवार अफजलखान को विदीर्ण करके सुशोभित होने लगी।
इस प्रकार का पराक्रम शिवाजी महाराज ने जब दिखाया तब अफजलखान के सिर के गोल-गोल घुमने से वह सुशोभित होने लगा।
तत्पश्चात् अपने खून की धाराओं से भूमि को भिगोकर, पागल मनुष्य की तरह मूर्च्छा के झटकों से व्याकुल हुआ, वह अफजलखान शिवाजी के शस्त्र द्वारा पेट से बाहर पड़ी हुई अंतडियो को यथास्थिति में अपने हाथों से पकड़कर 'इसने मुझे यहां मार दिया, इस शत्रु को शीघ्रता से नष्ट करो', इस प्रकार वह अपने पार्श्ववर्ती सेवक को बोलता है और वह अभिमानी सेवक भी उसी तलवार को उठाकर नष्ट करने की इच्छा से अचानक शिवाजी पर आक्रमण करता है।
ब्राह्मण को शिवाजी नष्ट नहीं करेगा। इस प्रकार जानबुझकर धनी अफजलखान ने उस ब्राह्मण योद्धा को युद्ध में प्रविष्ट किया था।
वह ब्राह्मण योद्धा है ऐसा सुनकर नीति से व्यवहार करने वाले शिवाजी राजा ने उसको जान से मारने की इच्छा नहीं की।
अफजलखान के वे सैनिक जब तक वहां नहीं पहुंचे, तब तक उसने उसी तलवार से शिवाजी पर प्रहार किया।
उसने प्रहार की हुई तलवार को उस समय शिवाजी ने अपने तलवार से रोक लिया और पट्टे से उस अफजलखान के सिर के दो टुकड़े कर दिये।
उन्नत शत्रु का पट्टे से काटा हुआ सिर वज्र से फोड़े गए पर्वत शिखर की तरह नीचे गिर गया।
उस स्थिति में शिवाजी इन्द्र हो गया वह म्लेच्छ पर्वत हो गया और तीक्ष्ण अंग्रेभाग वाला पट्टा भी उस समय वज्र हो गया।
कहीं पर शरीर गिर गया, कहीं पर अंतड़ियां फैल गई, कहीं पर मस्तक गिर गया, कहीं पर पगड़ी गिर गई, छत्री कहीं पर उड़ गई, चंवर भी एक तरफ गिर गया, सभी प्रकार के मोतियों एवं रत्नों के आभूषण कहीं पर गिर गए तो एक ओर छत्र तो दूसरी तरफ वस्त्र इस प्रकार की अवस्था को प्राप्त होकर वह दुष्ट अपने कर्मों के कारण ही भूमि पर बिखर गया।
जब तक उसके वे सैनिक आंखों के पलकों को बंद करके खोलते तब तक इस शिवाजी राजा ने उस यवन को तुरंत नीचे गिरा दिया।
वे अपने स्वामी (अफजलखान) को मरा देखकर अब्दुल सय्यद, बड़ा सय्यद, अफजलखान का घमण्डी भतीजा रहीमखान, अत्यन्त अभिमानी और बड़े घर का पहलवानखान, पिलाजी एवं शंकराजी मोहित ये दोनों वीर और वायु से भी अधिक वेगवान्, बलवान् एवं अफजलखान के पृष्ठ रक्षक ये चार एवं अन्य भी उस यवन सेना के नायक अत्यंत क्रोधित एवं गर्व के साथ शस्त्रों को उठाकर जंभासुर के नष्ट होने पर जैसे इन्द्र पर असुर तत्काल आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार शिवाजी को जान से मारने की इच्छा से सभी ने मिलकर उन पर आक्रमण किया।
उस समय उन शस्त्रयुगलों को घुमाते हुए उस शिवाजी ने अपने चारों ओर मानो विशाल प्राकार ही बना दिया हो।
उसने इस युद्ध में विचलित न होते हुए आकाश में गोल-गोल घूमते हुए स्पर्धा करने वाले शत्रुओं की आंखों को अहोरात्र गोल घुमवाया।
काले तलवार से एवं तीक्ष्ण पट्टे से उसने दिग्वलय के समान मण्डलों को बनाया।
तलवार को और पट्टे को बारंबार घुमाकर मण्डलों को बनाने वाले एवं गर्व करने वाले उस उप्रकर्मा शिवाजी को शत्रुपक्ष के और स्वपक्ष के सैनिक युद्ध में उस समय देख नहीं सकें।
क्षणभर में पृथ्वी में प्रवेश करता क्षणभर में आकाश में और क्षणभर मध्य में स्थित होता, इस प्रकार वह क्षणभर भी शान्त नहीं था।
आकाशीय विद्युत् के समान वेग से अपने पर आने वाले विरुद्ध वीरों के द्वारा किए गए अनेक तलवार के प्रहारों को उस स्वामी ने कभी पट्टे से तो कभी तलवार से और कभी उन दोनों से रोका।
तब संभाजी, कावजी, काताजी इंगळे, कोडाजी एवं येसाजी ये दोनों कंकवंशी, कृष्णाजी गायकवाड़, सुरजी कांटके, उसी प्रकार शिद्दी, इस प्रकार इन शिवाजी के रक्षक दस वीरों ने गर्जना करके, म्यान से प्रचंड तलवारों को निकालकर, पर्वत जैसे वायु रोकता है, उसी प्रकार उन्होंने वहां शत्रुपक्ष का विरोध किया।
उन-उन मुसलमानों के और उन मराठों की गर्जना से आकाश परिपूर्ण हो गया अश्वशाला में बंधा हुआ इंद्र का घोड़ा भी भाग गया।
हे राजा! तेरे पर इस तलवार के प्रहार को करता हूं, तू मेरा वार सहन कर, इस प्रकार बारंबार बोलता हुआ, उस समय बड़ा सय्यद सिंह की तरह प्रचंड गर्जना करने वाले एवं अफजलखान को जान से मारने वाले शिवाजी पर पुनः दौड़कर आक्रमण किया। वेगवान् जीवा महाल के निषेध करने पर भी इसको मैं ही जान से मारुंगा, इसको मेरे पास आने दें। इस महाराजा के कथन को अनसुना करके सय्यद द्वारा उठाए हुए उस तलवार के प्रहार को अपने ऊपर लिया और उस वीर ने अपने तलवार से सय्यद के दो टुकड़े कर दिये।
कावाजी, दोनों कंकवंशी, अभिमानी इंगळे, वीर मुरुंबक, उसी प्रकार करवर, क्रूर कांटके, गायकवाड़ और शिद्दी बर्बर इन्होंने क्रोध से लड़ने वाले दूसरे शत्रुओं को शीघ्रता से मार दिया।
कन्धे एवं हाथ से भग्न, पैर से टुटे हुए, मस्तक एवं मध्यभाग से टुटे हुए, लाख की तरह रक्त से रंजित चारों तरफ पड़े हुए उनके शरीर वहां चमकने लगे।
८३-८४. शक १५८१ विकारी संवत्सर के मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि तथा गुरुवार के दोपहर को देवों से द्वेष करने वाले अफजलखान को शिवाजी ने जान से मार दिया।
बलपूर्वक इस राजा ने बलवान् अफजलखान को जान से मार दिया तो अत्यन्त शीतल, असंख्य फुलों की सुगन्ध से युक्त, मंद-मंद वायु बहने लगी, नदियां भी अमृत के समान शुद्ध पानी से युक्त हो गई, तत्काल पृथ्वी अत्यन्त स्थिर हो गई, सभी देव भी अपने-अपने स्थान पर जाकर सुखी हो गए।
इस प्रकार अपने शत्रु को युद्ध में बल से मारकर, सशस्त्र शिवाजी सुशोभित होने लगा तो तीनों लोकों को व्याप्त करने वाली विजय सूचक एवं गंभीर दुंदुभी की ध्वनि किले पर हुई।
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धर्म का अन्वेषण
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