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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 43
निकृत्तस्कंधहस्तानि निकृत्तचरणानि च । निकृत्तमूर्धमध्यानि पतितानि समंततः ॥ लोहितेनानुलिप्तानि द्रुमामयसमश्रिया । तत्र तेषामहो तानि वपूंषि प्रचकाशिरे ॥
कन्धे एवं हाथ से भग्न, पैर से टुटे हुए, मस्तक एवं मध्यभाग से टुटे हुए, लाख की तरह रक्त से रंजित चारों तरफ पड़े हुए उनके शरीर वहां चमकने लगे।
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