मंडलानि वितन्वानं मन्वानं दर्पमात्मनि। पट्टिशं च कृपाणं च व्याधुन्वानं मुहुर्मुहुः ॥ तदा तमुग्रकर्माणं शिववर्माणमाहवे । न विलोकयितुं शेकुः परे स्वेपि च सैनिकाः ॥
तलवार को और पट्टे को बारंबार घुमाकर मण्डलों को बनाने वाले एवं गर्व करने वाले उस उप्रकर्मा शिवाजी को शत्रुपक्ष के और स्वपक्ष के सैनिक युद्ध में उस समय देख नहीं सकें।
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