क्षणं विशन्वसुमती क्षणमाकाशमाविशत्। मध्य एव क्षणं तिष्ठन् जोषमानीन्न स क्षणम् ॥
क्षणभर में पृथ्वी में प्रवेश करता क्षणभर में आकाश में और क्षणभर मध्य में स्थित होता, इस प्रकार वह क्षणभर भी शान्त नहीं था।
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