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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 23
ततो रुधिरधाराभिरार्दीकृतमहीतलः । प्रमत्त इव मोहेन घूर्णमानोऽतिविद्धलः ॥ यथैव शिवशखेण निः सुतान्युदराद्वहिः। तथैवान्त्राणि सर्वाणि बिभ्राणः स्वेन पाणिना ।। अनेन निहतोऽस्मीह जहोनमहितं जवात्। इति वक्ति स तं यावत् तत्पार्श्ववर्तिना ।। तमेवाफजलस्यासि समुद्यम्याभिमानिना। जिघांसयेव सहसा शिवराजोऽभ्यपद्यत ।।
तत्पश्चात् अपने खून की धाराओं से भूमि को भिगोकर, पागल मनुष्य की तरह मूर्च्छा के झटकों से व्याकुल हुआ, वह अफजलखान शिवाजी के शस्त्र द्वारा पेट से बाहर पड़ी हुई अंतडियो को यथास्थिति में अपने हाथों से पकड़कर 'इसने मुझे यहां मार दिया, इस शत्रु को शीघ्रता से नष्ट करो', इस प्रकार वह अपने पार्श्ववर्ती सेवक को बोलता है और वह अभिमानी सेवक भी उसी तलवार को उठाकर नष्ट करने की इच्छा से अचानक शिवाजी पर आक्रमण करता है।
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