अभ्रमन्नपि युद्धेऽस्मिन् स भ्रमन्नभ्रमन्तरा। अभ्रामयदहोरात्रं मिषतां द्विषतां दृशः ॥
उसने इस युद्ध में विचलित न होते हुए आकाश में गोल-गोल घूमते हुए स्पर्धा करने वाले शत्रुओं की आंखों को अहोरात्र गोल घुमवाया।
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