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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 45
विध्वस्तेऽफजलेबलिन्यपि बलेनैतेन भूमीभूता, वाति स्मातिहिमः प्रभूतकुसुमामोदी मूदुर्मारुतः । नद्यश्चापि सुधावदातसलिलाः सद्यः स्थिरा सुस्थिरा, स्वं स्वं स्थानमवाप्य निर्वृतहृदः सर्वेऽप्यभूवन्सुराः ॥
बलपूर्वक इस राजा ने बलवान् अफजलखान को जान से मार दिया तो अत्यन्त शीतल, असंख्य फुलों की सुगन्ध से युक्त, मंद-मंद वायु बहने लगी, नदियां भी अमृत के समान शुद्ध पानी से युक्त हो गई, तत्काल पृथ्वी अत्यन्त स्थिर हो गई, सभी देव भी अपने-अपने स्थान पर जाकर सुखी हो गए।
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