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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 8
अथ पर्वतपर्यन्तात् पंचाननमिवोद्रतम्। द्रुतप्रत्यर्पितपदं संप्रसज्य पुरः स्थितम्। ॥ सृण्यग्रसुंदरोदग्रव्यायतश्मश्रुभीषणम्। धीरं धीरदृशं वीरं शिवं रिपुरुदैक्षत ।।
पुनः किले के तट से सिंह की तरह बाहर निकलकर शीघ्र पगों को रखते हुए अत्यन्त समीप आकर खड़े हुए, अंकुशाग्र के समान सुन्दर, विशाल और लंबी दाढ़ी से भयंकर दिखने वाले, धैर्यवान् एवं धैर्वदृष्टि से युक्त शिवाजी को शत्रु ने देखा।
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