क्वचित्कबंधः प्रसूतः सस्तान्यान्वाणि च क्वचित् । न्यपतच्च क्वचिन्मूर्धा शिरोवेष्टोऽपि च क्वचित् ॥ विप्रकीर्ण क्वचिच्छत्रं प्रकीर्णकमपि क्वचित् । तत्तन्मुक्तामणिमयो रत्नोत्तंसः स च क्वचित् ॥ क्वचिद्वस्त्रं क्वचिच्छत्रं समासाद्य दशामिमाम् । सोलुठन्मेदिनीपृष्ठे दुष्टः स्वेनैव कर्मणा ॥
कहीं पर शरीर गिर गया, कहीं पर अंतड़ियां फैल गई, कहीं पर मस्तक गिर गया, कहीं पर पगड़ी गिर गई, छत्री कहीं पर उड़ गई, चंवर भी एक तरफ गिर गया, सभी प्रकार के मोतियों एवं रत्नों के आभूषण कहीं पर गिर गए तो एक ओर छत्र तो दूसरी तरफ वस्त्र इस प्रकार की अवस्था को प्राप्त होकर वह दुष्ट अपने कर्मों के कारण ही भूमि पर बिखर गया।
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