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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 19
ददाम्येतं कृपाणं ते गृहाण निगृहाण माम्। इदं विनिगदन्नेव धीरः सिंहसमस्वरः ॥ सिंहयायी सिंहकायः सिंहदृक् सिंहकंधरः। स्वपाणिद्वितयोद्धृतविकोशायुधसुन्दरः ।। तं निर्यातयितुं वैरं प्रवृत्तोसौ महाव्रतः। शिवः कृपाणिकाग्रेण कुक्षावेव तमस्पृशत् ।।
यह प्रहार तेरे पर करता हूं, वह ले, मुझे पकड़ इस प्रकार बोलता हुआ, सिंह के समान ध्वनि, सिंह के समान गति, सिंह के समान शरीर, सिंह जैसी दृष्टि, सिंह जैसी गर्दन वाला एवं अपने दोनों हाथों से घुमायी हुई नंगी तलवार से शोभायमान वह धैर्यवान् एवं सक्रिय शिवाजी, उस शत्रु से प्रतिशोध लेने में प्रवृत्त होकर अपने तलवार का अग्रभाग उसके पेट में घुसा दिया।
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