असौ जिष्णुरभूत्तव स म्लेच्छोऽभून्महीधरः । शितकोटिः पट्टिशोऽपि शतकोटिरभूत्तदा ॥
उस स्थिति में शिवाजी इन्द्र हो गया वह म्लेच्छ पर्वत हो गया और तीक्ष्ण अंग्रेभाग वाला पट्टा भी उस समय वज्र हो गया।
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