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शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 41
राजन्ददाम्यहं तुभ्यमसिमेत सहस्व मे। वदन्मुहुर्मुहुरदं वडाहः सय्यदस्तदा ॥ नदन्तं सिंहवद्धरि भूयोऽप्यफजलान्तकम् । प्रत्यधावन्निषिद्धोऽपि माहिलेन तरस्विना ॥ अहमेव निहन्स्येनमायात्वेष ममान्तिके । इति क्षितिपतेर्वाक्यमनाकर्ण्यव माहिलः ॥ तमसिं सय्यदोत्क्षिप्तं समादत्त स्ववर्मणा । व्यधाच्च सय्यदं वीरः करवालेन वै द्विधा ॥
हे राजा! तेरे पर इस तलवार के प्रहार को करता हूं, तू मेरा वार सहन कर, इस प्रकार बारंबार बोलता हुआ, उस समय बड़ा सय्यद सिंह की तरह प्रचंड गर्जना करने वाले एवं अफजलखान को जान से मारने वाले शिवाजी पर पुनः दौड़कर आक्रमण किया। वेगवान् जीवा महाल के निषेध करने पर भी इसको मैं ही जान से मारुंगा, इसको मेरे पास आने दें। इस महाराजा के कथन को अनसुना करके सय्यद द्वारा उठाए हुए उस तलवार के प्रहार को अपने ऊपर लिया और उस वीर ने अपने तलवार से सय्यद के दो टुकड़े कर दिये।
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