मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 21 • श्लोक 5
विविधाभिर्वि यथादिष्ट पुरोधसा। तथा नित्यवदभ्यर्च्य देवदेवं वृषध्वजम् ।। नित्यदानविधिं कृत्वा भुक्त्वा स्वल्पमनल्पधीः । सम्यगाचम्य च मुहुर्मुहुरंबु शुचि स्वयम् ।। चिन्तयित्वा च तां देवीं तुलजां क्षणमात्मनि। विधाय चात्मनो वेषं तदात्वोचितमात्मना ।। निजमप्रतिमं लोके विलोक्य मुकुरे मुखम् । उत्थाय चासनात्सद्यः प्रणिपत्य पुरोहितम्।। द्विजानन्यांश्च तैः सर्वैराशंसितशुभोदयः। दधिदुर्वाक्षतान् स्पृष्ट्वा दृष्ट्वा मार्तडमण्डलम्।। स्थितामभ्येत्य च पुरः सवत्सां स्वर्णसंयुताम्। वितीर्य सुरभिं सद्यः सगुणायाग्रजन्मने ।। उद्यताननुयानार्थमात्मीयाननुयायिनः । प्रतापिनः प्रतापाद्रेर्गुप्तये विनियुज्य च ।। तमन्तस्सच्छलं म्लेच्छमभ्येत्य स्थितमान्तिके । अभ्यगच्छदसौ हार्दादभ्यागतमिवात्मनः ।।
पुरोहित के द्वारा निर्दिष्ट विविध प्रकार की विधि से देवाधिदेव शंकर की नित्य की तरह पूजा करके, नित्य की दानविधि को करके, थोड़ा भोजन करके, स्वयं शुद्ध सीमित जल को बारंबार आचमन की तरह पीकर उस तुळजा देवी का क्षणमात्र मन में चिन्तन किया, उस समय के लिए उचित वेशभूषा को धारण करके लोक में अनुपम अपने मुख को दर्पण में देखा, शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों को नमस्कार करके उन सबका शुभ आशीर्वाद लिया, दही, दुर्वा अक्षत इनकों स्पर्श किया, सूर्यमण्डल देखा, सामने खड़ी बछड़े से युक्त गाय के समीप जाकर तत्काल सुवर्ण सहित उसको गुणवान् ब्राह्मण को दे दिया, अपने पीछे आने के लिए सज्ज पराक्रमी अनुयायियों को प्रतापगड़ की सुरक्षार्थ नियुक्त किया और मन में कपट को रख समीप आकर स्थित उस यवन की ओर वह महाबुद्धिमान् शिवाजी अपने अतिथि के संमुख जिस प्रकार जाना चाहिए, उस प्रकार स्नेहभाव से गया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें