पुरोहित के द्वारा निर्दिष्ट विविध प्रकार की विधि से देवाधिदेव शंकर की नित्य की तरह पूजा करके, नित्य की दानविधि को करके, थोड़ा भोजन करके, स्वयं शुद्ध सीमित जल को बारंबार आचमन की तरह पीकर उस तुळजा देवी का क्षणमात्र मन में चिन्तन किया, उस समय के लिए उचित वेशभूषा को धारण करके लोक में अनुपम अपने मुख को दर्पण में देखा, शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों को नमस्कार करके उन सबका शुभ आशीर्वाद लिया, दही, दुर्वा अक्षत इनकों स्पर्श किया, सूर्यमण्डल देखा, सामने खड़ी बछड़े से युक्त गाय के समीप जाकर तत्काल सुवर्ण सहित उसको गुणवान् ब्राह्मण को दे दिया, अपने पीछे आने के लिए सज्ज पराक्रमी अनुयायियों को प्रतापगड़ की सुरक्षार्थ नियुक्त किया और मन में कपट को रख समीप आकर स्थित उस यवन की ओर वह महाबुद्धिमान् शिवाजी अपने अतिथि के संमुख जिस प्रकार जाना चाहिए, उस प्रकार स्नेहभाव से गया।
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