विन्यस्यानीकमात्मीयं यथावस्थितमात्मना। एकेनाफजलेनैव प्रस्थेयं शत्रपाणिना ।। याप्ययानाधिरूढेन यातव्यं च पुरः पुनः। सन्तु तत्परिचर्यार्थ द्वित्रा एवानुजीविनः ॥ तथैव स्वयमभ्येत्य प्रतापाद्रेरुपत्यकाम्। शिवं प्रतीक्षमाणेन स्थेयं तत्रैव संसदि।। शिवेन च समभ्येत्य शखहस्तेन गौरवात्। आतिथ्यमतिथेस्तस्य विधातव्यं यथाविधि।। तिष्ठन्तु दंशिताः शूराः पृष्ठे दश दश स्थिराः। शरस्यांतरमासाद्य रक्षणाय द्वयोरपि ।। मिलिताभ्यामुभाभ्यां च कर्तव्यं तत्र तद्रहः। सर्वस्यापि हि लोकस्य भवेद्येन महान्महः ।।
अपनी सेना को यथास्थिति में रख करके स्वयं अफजलखान सशस्त्र आयें और पालकी में बैठकर आगे जायें, उनकी सेवा के लिए दो-तीन ही सेवक होने चाहिए, उसी प्रकार वह प्रतापगढ़ की उपत्यका के पास स्वयं आकर वहीं पर सभामंडप में शिवाजी की प्रतीक्षा करें और शिवाजी सशस्त्र आकर उस अतिथि का आदर सत्कार गौरव के साथ यथाविधि करें। दोनों के ही रक्षणार्थ सज्ज, स्वामिनिष्ठ, शूर एवं निष्ठावान् दस-दस सैनिक बाणों की सीमा पर आकर पृष्ठभाग में खड़े हो जायें और दोनों के आपस में मिलने पर सभी लोग आनन्दकारी बातें करें।
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