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अध्याय 16 — षोडश अध्याय

शिवभारतम्
57 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात्, अभीष्ट सिद्धि हो जाने से महमूदशाह अत्यन्त आनन्दित हुआ। किन्तु केवल पिता के लिए स्वयं ही सिंहगड़ को देने पर, कुटनीति में निपुण शिवाजी ने रणनीतिकार सेनोपंत नाम के ब्राह्मण मन्त्री को समीप बुलाकर कहा।
शिवाजी बोला - जिस धन्य पुरुष को लोग ज्ञान पुरुषों में अत्यन्त श्रेष्ठ समझते हैं, ऐसे मुझ को यह महामना शहाजी राजा वास्तव में नहीं पहचानते हैं।
अज्ञानी ने यदि सज्जन के विद्यमान गुणों को नहीं जाना तो न जाने किन्तु ज्ञानी ने भी यदि नहीं जाना तो वह बात सज्जन के मन को पीडित करती है।
यदि मुझे पहचानता तो वह सिंहगढ़ दुर्ग को देता ही नहीं, क्योंकि नहीं तो मेरी अधीनता में स्थित इस दुर्ग को बलपूर्वक कौन जीत सकेगा?
ज्ञानी होते हुए भी जिस पागल ने शत्रु आदिलशाह को मेरे से सिंहगड़ दुर्ग दिलवाया, ऐसे महाव्रती पुरुष को मैं क्या कहूँ?
वास्तव में स्वयं विश्व का नियन्ता हो इस प्रकार शत्रु पर विश्वास करके अपने घर में सुखपर्वक सोया, अतः वह शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया।
दीनहीन शत्रु के होने पर भी विद्वान् को उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जलते हुए दीपक को भी कीट-पतंग बुझा देते हैं।
यदि दीपक को बुझाते समय ही किसी पतंग का विनाश हो जाता है तो जन्म से अंधे के समान कौन उन दोनों की समानता बतायेगा?
वास्तव में एक चींटी भी हांथी के सूंड में घुसकर उसका विनाश कर देती है। अतः शत्रु को कभी भी क्षुद्र नहीं समझना चाहिए।
अहो! यह महाबाहु, बड़ा राजनीतिज्ञ होते हुए भी शत्रु की परवाह नहीं करता है, यह इसका सबसे बड़ा दोष है।
शत्रु के द्वारा पकड़े हुए मेरे पिता शहाजी की कारावास में जो अवस्था थी, उसका प्रतिशोध लेने के लिए मैं पूर्णतः तैयार हूं और आज से ही यवनों के विनाश के कारण मेरी इस संसार में पहचान होगी।
जो शत्रु से भयभीत होता है, उससे भी शत्रु भयभीत रहता है, फिर जो शत्रु से भयभीत नहीं होता, उससे तो शत्रु भयभीत होता ही है।
वास्तव में उन सभी यवन नायकों का विनाश करूंगा और इसलिए मैंने दोनों तरकसों के बाणों को तीक्ष्ण किया है।
विजापुर शहर को अधीन करने के लिए मेरा मन उत्सुक हो गया है, अतः तुमसे मेरा कहना है कि तुरन्त घुड़सवारों को तैयार किया जाए।
सोनोपंत बोला - बलवान् से शत्रुता, पापों का संचय, पूज्यों की एवं पिता की निन्दा, इन सबका परिणाम दुःखदाय होता है।
बलवान् से शत्रुता करके, तेरे पिता अत्यधिक अनुरोध के साथ सचेत नहीं रह सका। अतः वह पकड़ लिया गया, यह युक्त है।
वह शहाजी राजा पराक्रमी है और उसके मन्त्री भी कर्तव्यपारायण हैं, फिर भी उसने जो बलवान् के साथ शत्रुता की वह राजनीति के दृष्टि से गलत है।
यदि दुर्बल मनुष्य अत्यन्त बलवान् के साथ अत्यधिक शत्रुता करता है तो उसको पराजित करने के लिए वह पूर्णतः समर्थ होता है।
अपने से अधिक बलवान् शत्रु को कर देना चाहिए, समान बलवान् शत्रु के साथ मित्रता करनी चाहिए, न्यून सामर्थ्यवान् शत्रु को दण्ड देना चाहिए और भेद यह साधारण उपाय होता है।
जिस भेदनीति के अनुसरण से सम शत्रु प्रतिदिन न्यूनता को प्राप्त होकर समानता को छोड़ देता है और अत्यधिक बलशाली शत्रु अपने आधिक्य को छोड़ देता है, अतः उस भेद की कौन प्रशंसा नहीं करता है?
हे राजा! न्यून सामर्थ्यवान् शत्रु के साथ भी भेदनीति अपनाना योग्य है। क्योंकि न्यून सामर्थ्यवान् शत्रु का अत्यधिक दुर्बल हो जाना यह युद्ध में लाभकारी ही होगा।
यह दुःखी है, इस प्रकार मानते हुए यदि न्यून सामर्थ्यवान् शत्रु की सांत्वना की जाए तो वह अपने आपमें प्रशंसनीय होकर, अपने को बड़ा समझने लगता है।
हे राजा! दुर्बल शत्रु की प्रबलता तथा बलवान् शत्रु की दुर्बलता, काल की महिमा से ही संभव है।
वरुण की इस सम्मति में जो राजा अच्छी प्रकार ध्यान देता है, वह दुर्बल शत्रु पर शासन करता है।
समर्थ और असमर्थ ऐसे दो प्रकार के उपाय है। दुसरा उपाय निष्फल होता है किन्तु पहले प्रकार का उपाय सफल होता है।
स्त्रियां शक्ति का हरण करती हैं, शराब मति का विभ्रम करती है, द्यूतक्रीडा धन का नाश करती है, कंजूसी से कार्य की हानि होती है, कठोर संभाषण अकल्याणकारी है, उसी प्रकार मृगया से पाप लगता है और हे राजा! कठोर शासन अत्यन्त अपकीर्ति करने वाला होता है।
अतः इन सात व्यसनों का त्याग करना चाहिए, क्योंकि इनमें से एक व्यसन मतिभ्रम का साधक होता है।
यदि उनमें से एक के ही सेवन से मतिभ्रंश होता है तो अनेक के सेवन करने से कौन-सा मनुष्य अधोगति को प्राप्त नहीं होगा?
नीतिशास्त्र में रुचि न रखने वाला, अपने कार्य के प्रति आलसी, और व्यसनों में मग्न व्यक्ति को लक्ष्मी छोड़ देती है।
उसके अत्यधिक प्रमत्त हो जाने पर तो कोषाधिकारी खजाने को चुरा लेता है और दुष्ट राष्ट्र के अधिकारी प्रजा को पीड़ित करते हैं।
नाना प्रकार के व्यसनों से राजा का भ्रम वृद्धि को प्राप्त होता है और उसमें अतिशय वृद्धि हो जाने से उसका औचित्यपूर्ण व्यवहार नष्ट हो जाता है।
औचित्यपूर्ण व्यवहार के नष्ट होने पर लोग उसका अपमान करते हैं और कार्यों में नियुक्त किये गये लोग भी कार्य को शीघ्रता से पूर्ण नहीं करते हैं।
फिर अत्यन्त क्रोध के आवेश में आकर संसद में इकट्ठे हुए लोगों को ही प्रतिदिन उच्चध्वनि में भाषण देकर उनको पीड़ित करता है।
तत्पश्चात् प्रतिक्षण किये गए उनके अनादर के कारण अन्तकरण से खिन्न होकर वे उसके परोक्ष में वार्तालाप करते हैं और उसका उपहास भी करते हैं।
तत्पश्चात् कुछ लोग उसको छोड़ देते हैं, कुछ उसके प्रति उदासीन रहते है, कुछ उसके शत्रुपक्ष के साथ मिलकर सुख से रहते हैं, कुछ उसको क्रोधी समझकर शाप देते हैं और कुछ उसको न छोड़ते हुए भी पहले की तरह उसकी सेवा नहीं करते है।
इन सात व्यसनों में आसक्त होने से वह शत्रु के कपट रूपी बल को न जानता हुआ, केवल अहंकार से अपने को समर्थ समझता है।
चित्त के व्यसनों में आसक्त होने से जो इस प्रकार का हो जाता है, उसकी विजय के लिए यात्रा करने वाले शत्रु के द्वारा शीघ्र ही पराजय हो जाती है।
दुर्ग इतने मूल्यवान् नहीं है, वास्तव में पिता ही बहुमूल्य है, अतः पराक्रमी होते हुए भी तुमने सिंहगड़ दुर्ग को दिया।
शत्रु को इस सिंहगढ़ दुर्ग को देकर यदि शहाजी राजा मुक्त हो गये तो आपके द्वारा प्रदत्त सिंहगढ़ दुर्ग न दिये के समान है।
जिसने सिंहगड़ और बैंगलोर शहर को शहाजी रूपी मेरुपर्वत के समान माना, उस शत्रु ने विशेष क्या किया?
तुमने इस समय विजययात्रा प्रारम्भ की है और अत्यन्त पराक्रमी राजा की ही सम्पूर्ण पृथ्वी होती है।
सर्वप्रथम राजा, तत्पश्चात् मन्त्री, मित्र, विपुल धन, राष्ट्र, किले और सेना, ये सात राज्य के अंग हैं।
जिस राजा के ये अंग व्यवस्थित होते हैं, उस राज्य की सज्जन लोग प्रशंसा करते है। यदि वही राजा एक अंग से भी विहीन हो तो वह अन्यों के द्वारा उपहास का पात्र बन जाता है।
राजा का यह मस्तक है, मन्त्री मुख है, धन और सेना ये भुजाएं हैं, सम्पूर्ण राष्ट्र का यह शरीर है, मित्र यह शरीर है, मित्र यह जोड़ है और दुर्ग यह उसमें स्थित मजबूत हड्डी है, इस प्रकार विद्वानों ने राज्य के सात अंग बताये हैं।
इन सात अंगों से युक्त राज्य का धर्म आत्मा है, मन्त्र प्राण है, नीति यह बल है और अनीति दुर्बलता है। यथोचित दण्ड विधान यह शौर्य, शत्रु की उद्दण्डता अधर्म, आपस में भेद करना यह मद, दृढता, दीर्घायु है, लोकानुरंजन उत्कर्ष, दूरदर्शिता ही दृष्टि है, पराक्रम यह उज्ज्वल स्वरूप, आयुध यह विमल बुद्धि, उसी प्रकार बलवान् के साथ शत्रुता विघ्न कहा गया है, प्रमाद यह निन्द्रा और सावधानी यह जागृत अवस्था कही गई है।
सम और विषम ये दो प्रकार की शत्रुता कही गयी है। समान शत्रु के साथ शत्रुता यह पहली एवं बलवान् शत्रु के साथ शत्रुता यह दूसरी प्रकार की शत्रुता कही गई है।
समान शत्रुता में, समान बल होने से दोनों को ही विजय प्राप्त नही होगी, किन्तु विषम शत्रुता में अधिक बलवान् की ही अधिक बल होने से विजय निश्चित है।
फत्तेखान की पराजय से एवं मुसेखान के वध के कारण से हे महाराज! महमूदशाह रात-दिनं आपसे द्वेष करता है।
महाराज देखा! आपके राज्य के समीप स्थित आदिलशाह एवं दिल्ली के बादशाह, ये सामर्थ्यवान् यवन आपसे रात-दिन द्रोह करते हैं।
ये दोनों शत्रु, दोनों तरफ से आप पर क्रोधित हो गये है, अतः आपका यहां रहना सम्प्रति वास्तव में योग्य नहीं है।
इसलिए महाराज! अत्यन्त दुर्गम स्थान पर स्थित होकर जगत को जीतने के लिए प्रयत्न करो, आप शिवाजी के लिए क्या अजेय है?
शंकर ने कैलाश पर्वत का, इन्द्र ने मेरूपर्वत का और विष्णु ने समुद्र का आश्रय लिया है।
दुर्ग को केवल दुर्ग कहने से लोग दुर्ग नहीं मानते हैं, अपितु उसके स्वामी का दुर्गम होना ही उसकी दुर्गमता होती है।
राजा के कारण से दुर्ग दुर्गम होता है एवं दुर्ग के कारण से राजा दुर्गम होता है। दोनों के अभाव होने पर तो शत्रु ही दुर्गम होता है।
आपके जो दुर्ग है, वे सब प्रकार से, जिस प्रकार अत्यन्त दुर्लभ बन सकें, उस प्रकार शीघ्र प्रयत्न करना चाहिए।
सोनोपंत के ये बचन सुनकर अति महान माननीयों में माननीय, नृपश्रेष्ठ ने उनकी बातों को मान लिया।
तत्पश्चात् त्रिभुवन का पालन करने के लिए प्रभुत्व को धारण करने वाला, पिता के शत्रु से द्वेष करने वाला, यवनों के महान् नाश करने के लिए उत्सुक और निर्भय, ऐसा शिवाजी सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने हाथ के तलवे पर है, ऐसा समझने लगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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